1857 के विद्रोह के दौरान सुरेंद्र शाही ने झारखंड में हजारीबाग से नेतृत्व किया था। विद्रोही सैनिकों ने उन्हें हजारीबाग जेल से मुक्त कराया। उनके नेतृत्व में सेना पिथोरिया होते हुए रांची की ओर बढ़ी, किंतु अंग्रेजों के प्रतिरोध के कारण सेना लोहरदगा की ओर मुड़ गई। उनकी भूमिका पलामू में सक्रिय पीतांबर शाही जैसे अन्य नेताओं से भिन्न थी। 1857 के विद्रोह के समय हजारीबाग झारखंड क्षेत्र का एक प्रमुख केंद्र था।
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