डॉ. महुआ मांझी
हिंदी उपन्यास ‘मरांग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ डॉ. महुआ मांझी द्वारा लिखा गया है। यह उपन्यास पश्चिम सिंहभूम के चाईबासा क्षेत्र सहित झारखंड के आदिवासी समुदायों पर औद्योगिक खनन और प्रदूषण के प्रभावों का चित्रण करता है। यह कृति उनके उपन्यास ‘मैं बोरिशैला’ के बाद प्रकाशित हुई मानी जाती है।
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