भारत की मुद्रा का सबसे हालिया अवमूल्यन 1991 में हुआ था। यह भारत के आर्थिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी, क्योंकि इससे स्थिर विनिमय दर प्रणाली से अधिक बाजार-निर्धारित दर प्रणाली की ओर बदलाव हुआ। यह अवमूल्यन भुगतान संतुलन संकट के कारण शुरू किए गए व्यापक आर्थिक सुधारों का हिस्सा था, जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण और वैश्वीकरण की दिशा में मार्ग प्रशस्त किया। जुलाई 1991 में भारतीय रुपये का लगभग 18-19% अवमूल्यन किया गया था।
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