सत्यार्थ प्रकाश ("सत्य का अर्थ" या "सत्य का प्रकाश") 1875 में महर्षि दयानंद सरस्वती ने लिखा था, जो एक प्रभावशाली धार्मिक और सामाजिक सुधारक तथा आर्य समाज के संस्थापक थे। 1882 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसे संपादित किया। यह पुस्तक अब 20 से अधिक भाषाओं में अनूदित हो चुकी है, जिनमें संस्कृत और अंग्रेज़ी, फ्रेंच, जर्मन, स्वाहिली, अरबी और चीनी जैसी कई विदेशी भाषाएं शामिल हैं। पुस्तक का अधिकांश भाग स्वामी दयानंद के सुधारवादी विचारों पर केंद्रित है, जबकि अंतिम तीन अध्याय विभिन्न धार्मिक विश्वासों के तुलनात्मक अध्ययन की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करते हैं।
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