संथारा, जिसे सल्लेखना, पंडित-मरण या सखम-मरण भी कहते हैं, जैन धर्म का एक धार्मिक अनुष्ठान है जिसमें व्यक्ति उपवास के माध्यम से स्वेच्छा से अपने जीवन का अंत करता है। जैन धर्म की उत्पत्ति से ही इसका पालन किया जा रहा है और यह जैन ग्रंथों में वर्णित है जिन्हें आगम कहते हैं। इसके दो मुख्य प्रकार हैं: त्रिविहार, जिसमें व्यक्ति भोजन छोड़ देता है लेकिन पानी नहीं, और चतुर्विहार, जिसमें भोजन और पानी दोनों छोड़ दिए जाते हैं। जैन मान्यता के अनुसार संथारा तब अपनाया जाता है जब मृत्यु निकट हो या उम्र, बीमारी या अत्यधिक कठिनाई के कारण धार्मिक कर्तव्यों का पालन नहीं हो सकता। 2015 में राजस्थान उच्च न्यायालय ने संथारा को अवैध घोषित किया और इसे भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 306 के तहत आत्महत्या करार दिया, लेकिन इस फैसले पर बाद में सर्वोच्च न्यायालय (एससी) ने रोक लगा दी। हाल ही में यह प्रथा फिर से चर्चा में आई है, जिससे इसके धार्मिक, नैतिक और कानूनी पहलुओं पर ध्यान गया है।
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