सन् 1579 में महज़रनामा घोषित किया गया, जिसमें सम्राट ने कहा कि विचारों में असहमति होने पर वह किसी भी व्याख्या को चुनने का अधिकार रखते हैं। महज़रनामा के साथ अकबर ने असहिष्णु रूढ़िवादियों के प्रभुत्व को चुनौती दी और सच्चे धार्मिक भावना के विकास की अनुमति दी। महज़रनामा अबुल फज़ल और फैज़ी के पिता की एक सोच थी, जिसमें राजा की सत्ता को एक मुजतहिद (धर्म के विद्वान) से अधिक माना गया और यदि कोई भिन्नता हो, तो सम्राट का निर्णय भारत के मुसलमानों पर बाध्यकारी होना चाहिए। इस आदेश के साथ अकबर का निर्णय हर कानूनी और धार्मिक प्राधिकरण से ऊपर रखा गया, जिससे यह शाही अचूकता के सिद्धांत की घोषणा थी।
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