हीर रांझा की रचना वारिस शाह ने की थी। कुछ इतिहासकार इसे उनकी मौलिक रचना मानते हैं, जबकि कुछ का कहना है कि हीर और रांझा वास्तविक पात्र थे, जो 15वीं और 16वीं शताब्दी में लोदी वंश के समय जीवित थे। वारिस शाह ने इन पात्रों को अपनी रचना में इस्तेमाल किया। उन्होंने इसे 1766 में लिखा था। वारिस शाह के अनुसार यह कहानी गहरे अर्थों को दर्शाती है, जो मनुष्य की ईश्वर की खोज को प्रतीकात्मक रूप से प्रस्तुत करती है।
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