इस मस्जिद का निर्माण मुगल सम्राट शाहजहां की बेटी ने 1648 ईस्वी में करवाया था। इसे बनाने में 5000 से अधिक मजदूरों ने काम किया था। इसे मूल रूप से मस्जिद-ए-जहांनुमा कहा जाता था, जिसका अर्थ है 'दुनिया को देखने वाली मस्जिद'।
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