गांधीजी की पत्रिका 'हरिजन' ने सबसे पहले वर्धा मूल शिक्षा योजना को उजागर किया। 1937 में इस विषय पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ, जिसकी अध्यक्षता महात्मा गांधी ने की। प्रस्ताव के अनुसार 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा दी जानी थी। शिक्षा का माध्यम मातृभाषा रखा गया। पारंपरिक शिक्षा पद्धति को त्यागकर उत्पादक कार्य के माध्यम से शिक्षा देने की बात कही गई। यह भी निर्णय लिया गया कि किसी प्रकार की धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।
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