हिंदी के दर्जे को बढ़ाने वाले कारक: प्रसिद्ध शिक्षाविद और लेखक भूदेव मुखर्जी का योगदान महत्वपूर्ण था। उन्होंने 1892 से पहले बिहार के स्कूलों और न्यायालयों में नागरी लिपि को स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई। 1893 में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हिंदी और नागरी लिपि को बढ़ावा देने के लिए की गई थी। 1920 के अंत में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की भाषा नीति ने हिंदी को हिंदुस्तान की मातृभाषा के रूप में स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त किया।
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