सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पुराने लंबित मामलों के लिए गठित कीं चार विशेष पीठें
भारतीय न्यायपालिका में लंबित मामलों का निपटारा लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रहा है। इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 13 जुलाई 2026 से सबसे पुराने लंबित दीवानी और आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिए चार विशेष डिवीजन पीठों का गठन किया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य वर्षों से लंबित मामलों का तेजी से निस्तारण कर न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना है। इस संबंध में भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने नया रोस्टर अधिसूचना जारी की, जो 13 जुलाई 2026 से प्रभावी हो गई।
विशेष पीठों का गठन और कार्यप्रणाली
सुप्रीम कोर्ट में न्यायिक कार्य रोस्टर प्रणाली के तहत संचालित होता है, जिसमें मुख्य न्यायाधीश विभिन्न पीठों के बीच मामलों का आवंटन करते हैं। सामान्यतः एक डिवीजन पीठ में दो न्यायाधीश शामिल होते हैं। नई व्यवस्था के तहत न्यायमूर्ति पी.के. मिश्रा और न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी की अध्यक्षता वाली दो डिवीजन पीठें सबसे पुराने दीवानी मामलों की सुनवाई करेंगी। वहीं न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की अध्यक्षता वाली दो डिवीजन पीठें सबसे पुराने आपराधिक मामलों पर सुनवाई करेंगी। ये विशेष पीठें प्रत्येक मंगलवार, बुधवार और गुरुवार को बैठेंगी। सुप्रीम कोर्ट में इन दिनों को गैर-विविध (नॉन-मिसलेनियस) दिवस माना जाता है, जिन पर सूचीबद्ध मामलों की नियमित सुनवाई की जाती है।
लंबित मामलों की वर्तमान स्थिति
13 जुलाई 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में कुल 96,045 मामले लंबित थे। इनमें 74,244 दीवानी मामले और 21,801 आपराधिक मामले शामिल हैं। इन लंबित मामलों में से लगभग 800 सबसे पुराने मामलों को प्राथमिकता के आधार पर चिन्हित किया गया है। प्रारंभिक चरण में चारों विशेष पीठों को लगभग 200-200 मामलों की जिम्मेदारी सौंपी गई है। यह पहल विशेष रूप से उन मामलों के त्वरित निस्तारण पर केंद्रित है जो कई दशकों से न्यायालय में लंबित हैं।
तीन दशक से अधिक पुराने मामलों पर विशेष ध्यान
प्राथमिकता सूची में शामिल कुछ मामले 30 वर्षों से भी अधिक समय से लंबित हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार सबसे पुराना दीवानी मामला वर्ष 1986 का है, जबकि सबसे पुराना आपराधिक मामला वर्ष 1991 में दर्ज किया गया था। इतने पुराने मामलों के शीघ्र निपटारे से न केवल संबंधित पक्षों को राहत मिलेगी, बल्कि न्यायपालिका की कार्यकुशलता और विश्वसनीयता भी मजबूत होगी।
न्यायिक प्रशासन में इस पहल का महत्व
लंबित मामलों की संख्या किसी भी न्यायिक व्यवस्था की कार्यक्षमता का महत्वपूर्ण संकेतक होती है। पुराने मामलों के लिए अलग विशेष पीठों का गठन सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक केस-प्रबंधन प्रणाली का हिस्सा है। इससे नियमित मामलों की सुनवाई प्रभावित किए बिना पुराने विवादों का तेजी से निस्तारण संभव हो सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रकार की व्यवस्थाओं को निरंतर अपनाया जाए तो न्यायालयों में लंबित मामलों का बोझ कम करने में उल्लेखनीय सफलता मिल सकती है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- भारत का सर्वोच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत स्थापित सर्वोच्च न्यायिक संस्था है।
- सुप्रीम कोर्ट में मामलों के आवंटन के लिए रोस्टर तैयार करने की जिम्मेदारी भारत के मुख्य न्यायाधीश की होती है।
- सुप्रीम कोर्ट की एक डिवीजन पीठ में सामान्यतः दो न्यायाधीश शामिल होते हैं।
- सुप्रीम कोर्ट में गैर-विविध (नॉन-मिसलेनियस) दिवसों पर सूचीबद्ध मामलों की नियमित सुनवाई की जाती है।
सबसे पुराने लंबित मामलों के लिए विशेष पीठों का गठन न्यायपालिका की दक्षता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। इससे दशकों से लंबित मामलों के शीघ्र निस्तारण की संभावना बढ़ेगी और न्याय प्राप्ति की प्रक्रिया अधिक प्रभावी एवं समयबद्ध बन सकेगी। साथ ही यह कदम न्यायिक प्रशासन में बेहतर केस-मैनेजमेंट की दिशा में भी एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करता है।