सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों की घरेलू देखभाल को माना अलग क्षतिपूर्ति योग्य नुकसान
सुप्रीम कोर्ट ने 11 जून 2026 को एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि गृहिणी द्वारा परिवार को प्रदान की जाने वाली घरेलू देखभाल और सेवाओं की हानि मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में एक अलग और क्षतिपूर्ति योग्य मद (Head of Damages) है। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने ऐसे मामलों में घरेलू सेवाओं का न्यूनतम मूल्य ₹30,000 प्रति माह निर्धारित किया। यह फैसला गृहिणियों के अवैतनिक श्रम और पारिवारिक योगदान को कानूनी मान्यता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
मोटर दुर्घटना मुआवजा व्यवस्था क्या है?
भारत में सड़क दुर्घटनाओं से संबंधित मुआवजा दावों का निपटारा मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत किया जाता है। ऐसे मामलों की सुनवाई मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (Motor Accident Claims Tribunals – MACT) द्वारा की जाती है। मुआवजा तय करते समय न्यायालय आर्थिक (Pecuniary) और गैर-आर्थिक (Non-Pecuniary) दोनों प्रकार की हानियों का मूल्यांकन करते हैं। इनमें चिकित्सा व्यय, आय की हानि, आश्रितों की क्षति, वैवाहिक सहयोग की हानि तथा अन्य संबंधित नुकसान शामिल होते हैं।
घरेलू कार्य को मिली नई कानूनी मान्यता
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गृहिणी का योगदान केवल घर के कामकाज तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह पूरे परिवार के सामाजिक और आर्थिक ढांचे को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। घरेलू कार्यों में बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की सेवा, भोजन बनाना, घर की सफाई, घरेलू प्रबंधन और परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं का ध्यान रखना शामिल है। न्यायालय ने माना कि इन सेवाओं का आर्थिक मूल्य है और किसी दुर्घटना में गृहिणी की मृत्यु होने पर परिवार को इन सेवाओं के नुकसान की भरपाई मिलनी चाहिए।
₹30,000 प्रति माह का मानक मूल्य
पीठ ने कहा कि घरेलू देखभाल की हानि को मुआवजा निर्धारण में अलग आधार के रूप में शामिल किया जाना चाहिए। इसके लिए गृहिणी द्वारा प्रदान की जाने वाली घरेलू सेवाओं का न्यूनतम मूल्य ₹30,000 प्रति माह माना जाएगा। यह राशि अन्य मुआवजा मदों के अतिरिक्त होगी। इससे पहले कई मामलों में घरेलू कार्यों के मूल्यांकन के लिए अनुमानित या काल्पनिक आय (Notional Income) का सहारा लिया जाता था, लेकिन अब “घरेलू देखभाल की हानि” को स्वतंत्र क्षतिपूर्ति श्रेणी के रूप में स्वीकार किया गया है।
प्राण सेठी फैसले से संबंध
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह नया सिद्धांत वर्ष 2017 के प्रसिद्ध मामले ‘नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी’ में निर्धारित मुआवजा सिद्धांतों के अतिरिक्त होगा। प्राण सेठी निर्णय ने मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में विभिन्न क्षतिपूर्ति मदों और उनकी गणना के लिए महत्वपूर्ण दिशानिर्देश प्रदान किए थे। वर्तमान फैसला उन सिद्धांतों को और विस्तारित करता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के दिसंबर 2024 के एक फैसले के विरुद्ध दायर अपील से संबंधित था। मामला रेशमा नामक महिला की मृत्यु से जुड़ा था, जिनकी नवंबर 2001 में एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों के योगदान के व्यापक सामाजिक और आर्थिक महत्व पर बल देते हुए यह ऐतिहासिक टिप्पणी की।
लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से आग्रह किया कि वे मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों की नियमित निगरानी करें और जहां संभव हो, इन मामलों का निपटारा एक वर्ष के भीतर सुनिश्चित करें। न्यायालय का मानना है कि दुर्घटना पीड़ितों और उनके परिवारों को समय पर न्याय और मुआवजा मिलना अत्यंत आवश्यक है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- मोटर वाहन अधिनियम, 1988 भारत में सड़क दुर्घटना मुआवजा दावों का कानूनी आधार प्रदान करता है।
- मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) दुर्घटना से संबंधित मुआवजा मामलों की सुनवाई करता है।
- ‘नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी’ वर्ष 2017 का महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट निर्णय है।
- घरेलू कार्यों में बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की सेवा, भोजन बनाना और घरेलू प्रबंधन शामिल हैं।
- गृहिणियों के अवैतनिक श्रम का मूल्यांकन कई मामलों में अनुमानित आय पद्धति के आधार पर किया जाता रहा है।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय न्याय व्यवस्था में गृहिणियों के योगदान को अधिक सम्मान और कानूनी पहचान प्रदान करता है। घरेलू कार्यों के आर्थिक महत्व को स्वीकार करते हुए न्यायालय ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि परिवार के लिए किया गया अवैतनिक श्रम भी समाज और अर्थव्यवस्था के लिए मूल्यवान है तथा उसकी हानि की उचित क्षतिपूर्ति मिलनी चाहिए।