सुप्रीम कोर्ट ने फुटपाथ पर चलने को मौलिक अधिकार माना
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 19 जून 2026 को एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि चिन्हित और सुव्यवस्थित फुटपाथों पर सुरक्षित रूप से चलना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। यह फैसला न केवल पैदल यात्रियों की सुरक्षा से जुड़ा है, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रता, गरिमा और जीवन के अधिकार को भी मजबूत करता है। न्यायालय ने कहा कि शहरों और कस्बों के विकास में पैदल चलने वालों के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती और मोटर वाहनों की सुविधा को नागरिकों की सुरक्षा से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण फैसला
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) और अनुच्छेद 21 का विशेष उल्लेख किया। अनुच्छेद 19(1)(d) नागरिकों को भारत के पूरे क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से घूमने-फिरने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। न्यायालय ने माना कि सुरक्षित रूप से पैदल चलने की सुविधा इन संवैधानिक अधिकारों का अभिन्न हिस्सा है। इसके अलावा, निर्णय में अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(b) और 19(1)(c) का भी संदर्भ दिया गया, क्योंकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा और संगठन बनाने जैसे अधिकारों के प्रभावी उपयोग के लिए नागरिकों का सुरक्षित आवागमन आवश्यक है।
मामले की पृष्ठभूमि और न्यायालय की टिप्पणी
यह फैसला एक मोटर दुर्घटना मुआवजा मामले के दौरान आया। मामला एक पांच वर्षीय बालक की दुखद मृत्यु से जुड़ा था, जो अपने पिता के साथ स्कूल जाते समय एक ट्रक की चपेट में आ गया था। इस घटना ने सड़क सुरक्षा और पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित बुनियादी ढांचे की आवश्यकता को प्रमुखता से सामने रखा। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा द्वारा लिखे गए इस निर्णय में न्यायमूर्ति ए.एस. चंदूरकर भी पीठ का हिस्सा थे। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि किसी क्षेत्र में सड़क मौजूद है, तो वहां पैदल यात्रियों के लिए चिन्हित और रखरखावयुक्त फुटपाथ उपलब्ध कराना संबंधित प्राधिकरणों की कानूनी जिम्मेदारी है।
स्थानीय निकायों और प्रशासन की जिम्मेदारी
निर्णय के अनुसार, फुटपाथों का निर्माण, सीमांकन, रखरखाव और सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी शहरी विकास प्राधिकरणों, नगर निगमों, नगरपालिकाओं और पंचायतों पर होगी। न्यायालय ने कहा कि केवल सड़क बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित मार्ग उपलब्ध कराना भी प्रशासनिक दायित्व का हिस्सा है। साथ ही, न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि नागरिकों के इस अधिकार का उल्लंघन होता है, तो वे संवैधानिक और कानूनी उपायों का सहारा ले सकते हैं। अदालत ने सरकार और भारत के विधि आयोग से एक व्यापक वैधानिक ढांचा तैयार करने पर विचार करने का आग्रह किया, जिसमें जिम्मेदार संस्थाओं की पहचान, शिकायत निवारण व्यवस्था और एक समर्पित नियामक संस्था की व्यवस्था हो।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- अनुच्छेद 19(1)(d) भारतीय नागरिकों को देश के किसी भी हिस्से में स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 21 को भारतीय संविधान के सबसे महत्वपूर्ण मौलिक अधिकारों में माना जाता है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
- नगर निगम और नगरपालिकाएं शहरी स्थानीय स्वशासन की प्रमुख संस्थाएं हैं, जो नागरिक सुविधाओं के प्रबंधन का कार्य करती हैं।
- भारत का विधि आयोग कानूनों की समीक्षा, सुधार और नए विधायी सुझाव देने वाला एक महत्वपूर्ण वैधानिक निकाय है।
सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय शहरों और कस्बों में पैदल यात्रियों की सुरक्षा को नई संवैधानिक मान्यता प्रदान करता है। यह फैसला केवल सड़क अवसंरचना से जुड़ा आदेश नहीं है, बल्कि नागरिकों के सम्मानजनक, सुरक्षित और स्वतंत्र जीवन के अधिकार को मजबूत करने वाला एक ऐतिहासिक कदम भी है। आने वाले समय में यह निर्णय शहरी नियोजन और सार्वजनिक सुरक्षा नीतियों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकता है।