बिहार मतदाता सूची संशोधन को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी

बिहार मतदाता सूची संशोधन को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 को बिहार में निर्वाचन आयोग द्वारा किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) को संवैधानिक और वैध ठहराया। इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने की। अदालत के फैसले को चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची की पारदर्शिता के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

क्या है स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूचियों को अद्यतन और शुद्ध करने के लिए चलाया जाने वाला विशेष अभियान है। बिहार में इस प्रक्रिया के दौरान लगभग 7.9 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं की जांच की गई। संशोधन के बाद अंतिम मतदाता सूची में 7.42 करोड़ मतदाता शामिल पाए गए। इस प्रक्रिया का उद्देश्य दोहराव, मृत मतदाताओं के नाम और गलत प्रविष्टियों को हटाना था।

संवैधानिक आधार और सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग को चुनावों के संचालन, नियंत्रण और पर्यवेक्षण का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) को भी अनुच्छेद 324 के साथ पढ़ते हुए आयोग की कार्रवाई को वैध माना। धारा 21 मतदाता सूचियों की तैयारी और पुनरीक्षण से संबंधित है।

नागरिकता और मतदाता सूची

अदालत ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग चुनावी उद्देश्यों के लिए नागरिकता से जुड़े मामलों की जांच कर सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति की नागरिकता पर अंतिम निर्णय देने का अधिकार केवल नागरिकता अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकरणों को है। सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को निर्देश दिया कि 2003 की मतदाता सूची से गैर-नागरिकता के आधार पर हटाए गए मामलों को चार सप्ताह के भीतर सक्षम प्राधिकरण के पास भेजा जाए। यदि व्यक्ति भारतीय नागरिक पाया जाता है, तो उसका नाम पुनः मतदाता सूची में जोड़ा जाए।

अन्य राज्यों में भी चला अभियान

बिहार के अलावा पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में भी विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया चलाई गई। तेज शहरीकरण, बड़े पैमाने पर पलायन, मतदाता सूची में दोहराव और लंबे समय से व्यापक पुनरीक्षण न होने के कारण यह अभियान आवश्यक माना गया।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

” संविधान का अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को चुनाव संचालन का अधिकार देता है। ” जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 मतदाता सूचियों का कानूनी ढांचा प्रदान करता है। ” नागरिकता से जुड़े मामलों का निर्णय नागरिकता अधिनियम के तहत किया जाता है। ” एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स चुनाव सुधार से जुड़ा प्रमुख संगठन है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता और मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे निर्वाचन आयोग की संवैधानिक शक्तियों को भी स्पष्ट समर्थन मिला है।

Originally written on May 28, 2026 and last modified on May 28, 2026.

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