नीलगिरि में देशी फलदार वृक्षों की खेती को बढ़ावा, जैव विविधता संरक्षण पर जोर

नीलगिरि में देशी फलदार वृक्षों की खेती को बढ़ावा, जैव विविधता संरक्षण पर जोर

तमिलनाडु के नीलगिरि जिले में देशी फलदार वृक्षों की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए जिला प्रशासन और बागवानी विभाग द्वारा संयुक्त पहल शुरू की गई है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य स्थानीय जैव विविधता का संरक्षण, किसानों की आय के नए स्रोत विकसित करना और पारंपरिक कृषि प्रणालियों को मजबूत बनाना है। इसके तहत कुन्नूर स्थित पोमोलॉजिकल स्टेशन में देशी फलदार वृक्षों के लिए एक विशेष एकड़ भूमि समर्पित की गई है, जहां विभिन्न स्थानीय प्रजातियों का संरक्षण और संवर्धन किया जाएगा।

नीलगिरि के देशी फलदार वृक्ष

नीलगिरि की पहाड़ियों में कई प्रकार के स्वदेशी फलदार वृक्ष प्राकृतिक रूप से पाए जाते हैं। नई पहल के अंतर्गत जिन प्रमुख प्रजातियों की पहचान की गई है, उनमें जंगली अंजीर (वाइल्ड फिग), मंकी फ्रूट, जंगली अमरूद, जामुन तथा स्थानीय रूप से विक्की फ्रूट के नाम से प्रसिद्ध एलियोकार्पस टेक्टोरियस शामिल हैं। ये वृक्ष न केवल स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, बल्कि पक्षियों, वन्यजीवों और परागण करने वाले जीवों के लिए भी भोजन का महत्वपूर्ण स्रोत प्रदान करते हैं। इनके संरक्षण से क्षेत्र की प्राकृतिक जैव विविधता को बनाए रखने में सहायता मिलेगी।

किसानों को बागवानी विभाग का सहयोग

नीलगिरि का बागवानी विभाग किसानों को देशी फलदार वृक्षों की खेती के लिए तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान कर रहा है। इसके साथ ही फलदार पौधों और पारंपरिक सब्जियों की खेती के लिए रियायती दरों पर रोपण सामग्री भी उपलब्ध कराई जा रही है। इस पहल का उद्देश्य किसानों को ऐसी फसलों की ओर आकर्षित करना है जो स्थानीय जलवायु के अनुकूल हों और कम संसाधनों में बेहतर उत्पादन दे सकें। इससे कृषि की स्थिरता और पर्यावरणीय संतुलन दोनों को लाभ मिलने की उम्मीद है।

अंतरवर्तीय खेती से बढ़ेगा कृषि विविधीकरण

नीलगिरि में यूनाइटेड प्लांटर्स एसोसिएशन ऑफ सदर्न इंडिया (UPASI) द्वारा चाय बागानों में अंतरवर्तीय खेती का प्रयोग भी किया जा रहा है। इस मॉडल के तहत चाय के साथ फलदार और औषधीय पौधों की खेती की जा रही है। अंतरवर्तीय खेती वह कृषि पद्धति है जिसमें एक ही भूमि पर एक ही मौसम या आंशिक रूप से ओवरलैप होने वाली अवधि में दो या अधिक फसलें उगाई जाती हैं। इससे भूमि का बेहतर उपयोग होता है, किसानों को अतिरिक्त आय प्राप्त होती है और जैव विविधता को भी बढ़ावा मिलता है।

स्थानीय जैव विविधता संरक्षण का महत्व

देशी फलदार वृक्ष स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल होते हैं और इनकी देखभाल के लिए अपेक्षाकृत कम संसाधनों की आवश्यकता होती है। ये वृक्ष मिट्टी संरक्षण, जल संरक्षण और वन्यजीव आवास के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक कृषि में स्थानीय प्रजातियों की उपेक्षा के कारण जैव विविधता प्रभावित हुई है। ऐसे में नीलगिरि में शुरू की गई यह पहल पारंपरिक पौधों और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • नीलगिरि जिला तमिलनाडु में स्थित है और प्रसिद्ध पर्वतीय नगर कुन्नूर इसी जिले का हिस्सा है।
  • पोमोलॉजिकल स्टेशन फल अनुसंधान और फलदार पौधों के विकास से संबंधित बागवानी केंद्र होता है।
  • जामुन का वैज्ञानिक नाम Syzygium cumini है और यह भारत का एक प्रमुख उष्णकटिबंधीय फलदार वृक्ष है।
  • अंतरवर्तीय खेती (Intercropping) का व्यापक उपयोग चाय, कॉफी और अन्य बागान आधारित कृषि प्रणालियों में किया जाता है।

नीलगिरि में देशी फलदार वृक्षों की खेती को बढ़ावा देने की यह पहल कृषि विकास और जैव विविधता संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इससे स्थानीय किसानों को नए अवसर मिलेंगे, पारंपरिक प्रजातियों का संरक्षण होगा और क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा को भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने में सहायता मिलेगी।

Originally written on June 20, 2026 and last modified on June 20, 2026.

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