दूरसंचार विभाग ने सैटकॉम स्पेक्ट्रम आवंटन के लिए जारी किए मसौदा नियम 2026
भारत के दूरसंचार विभाग (डीओटी) ने 17 जून 2026 को दूरसंचार (प्रशासनिक प्रक्रिया द्वारा स्पेक्ट्रम आवंटन) नियम, 2026 का मसौदा जारी किया। इन प्रस्तावित नियमों का उद्देश्य उपग्रह संचार सेवाओं के लिए स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया को स्पष्ट करना और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों को मजबूत बनाना है। मसौदे के अनुसार, सैटकॉम कंपनियों को भारत में सेवाएं शुरू करने से पहले स्पेक्ट्रम आवंटन के साथ-साथ केंद्र सरकार से सुरक्षा मंजूरी भी प्राप्त करनी होगी।
सैटकॉम स्पेक्ट्रम के लिए नया नियामकीय ढांचा
मसौदा नियम उपग्रह संचार सेवाओं जैसे सैटेलाइट फोन, ब्रॉडबैंड और अन्य संचार सेवाओं पर लागू होंगे। ये नियम उन कंपनियों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं जो भारत में वाणिज्यिक सैटकॉम सेवाएं शुरू करना चाहती हैं। इनमें स्टारलिंक, यूटेलसैट वनवेब और जियो सैटकॉम जैसी कंपनियां शामिल हैं, जिन्हें संचालन के लिए स्पेक्ट्रम आवंटन की आवश्यकता होगी। नई व्यवस्था के तहत केवल दूरसंचार विभाग का लाइसेंस प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं होगा। कंपनियों को सेवा शुरू करने से पहले केंद्र सरकार से स्पष्ट सुरक्षा मंजूरी भी लेनी होगी।
स्वीकृति प्रक्रिया और संचालन संबंधी शर्तें
मसौदा नियमों के अनुसार किसी भी सैटकॉम ऑपरेटर को पहले सुरक्षा मंजूरी प्राप्त करनी होगी, जिसके बाद उसे लेटर ऑफ इंटेंट जारी किया जाएगा। लेटर ऑफ इंटेंट एक प्रारंभिक स्वीकृति होती है, जो औपचारिक लाइसेंस जारी होने से पहले दी जाती है। इसके बाद ऑपरेटरों को अंतिम स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रतीक्षा करनी होगी। सभी आवश्यक अनुमतियां प्राप्त होने के बाद ही कंपनियां उपभोक्ताओं को सेवाएं प्रदान कर सकेंगी। नियमों में यह भी प्रस्तावित किया गया है कि सैटकॉम कंपनियां सरकारी अनुमति के बिना अपने दूरसंचार नेटवर्क को सार्वजनिक दूरसंचार नेटवर्क से नहीं जोड़ सकेंगी। इस प्रावधान का उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा और नेटवर्क नियंत्रण को मजबूत बनाना है।
स्पेक्ट्रम आवंटन और शुल्क व्यवस्था
मसौदा नियमों के अनुसार उपग्रह संचार स्पेक्ट्रम का आवंटन नीलामी के बजाय प्रशासनिक प्रक्रिया के माध्यम से किया जाएगा। प्रशासनिक आवंटन का अर्थ है कि सरकार निर्धारित मानदंडों के आधार पर स्पेक्ट्रम उपलब्ध कराएगी, न कि प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के माध्यम से। प्रस्तावित शुल्क संरचना के तहत प्रति टर्मिनल वार्षिक शुल्क 30,000 रुपये से लेकर 50 लाख रुपये तक हो सकता है। इसके अतिरिक्त 1,000 रुपये का गैर-वापसी योग्य आवेदन शुल्क भी निर्धारित किया गया है। यह शुल्क संरचना विभिन्न प्रकार की सेवाओं और परिचालन आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए बनाई गई है।
परामर्श प्रक्रिया और आगे की कार्रवाई
दूरसंचार विभाग ने मसौदा नियमों पर सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित करने के लिए 30 दिनों की परामर्श अवधि निर्धारित की है। इस अवधि के दौरान उद्योग जगत, विशेषज्ञ और अन्य हितधारक अपने सुझाव प्रस्तुत कर सकेंगे। प्राप्त टिप्पणियों के आधार पर अंतिम नियमों को अधिसूचित किया जाएगा।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- सैटकॉम (सैटेलाइट कम्युनिकेशन) उपग्रहों के माध्यम से आवाज, डेटा और ब्रॉडबैंड सेवाएं प्रदान करता है।
- प्रशासनिक स्पेक्ट्रम आवंटन में सरकार बिना नीलामी के स्पेक्ट्रम आवंटित करती है।
- लेटर ऑफ इंटेंट औपचारिक लाइसेंस से पहले जारी की जाने वाली प्रारंभिक स्वीकृति होती है।
- सार्वजनिक दूरसंचार नेटवर्क में वे स्थलीय नेटवर्क शामिल होते हैं जो आम जनता को आवाज और डेटा सेवाएं प्रदान करते हैं।
दूरसंचार विभाग द्वारा जारी यह मसौदा भारत के उपग्रह संचार क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे एक ओर सैटकॉम सेवाओं के विस्तार का मार्ग प्रशस्त होगा, वहीं दूसरी ओर सुरक्षा और नियामकीय निगरानी को भी मजबूत किया जाएगा। आने वाले समय में अंतिम नियम भारत के डिजिटल और अंतरिक्ष संचार क्षेत्र के विकास की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।