त्रिपुरा स्वायत्त जिला परिषद चुनाव में टिपरा मोथा पार्टी की बड़ी जीत
त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (TTAADC) चुनाव में टिपरा मोथा पार्टी (TMP) ने लगातार दूसरी बार शानदार जीत दर्ज की है। जनजातीय आधार वाली इस क्षेत्रीय पार्टी ने 28 निर्वाचित सीटों में से 24 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। इस जीत के साथ पार्टी ने न केवल 2021 के अपने प्रदर्शन में सुधार किया, बल्कि त्रिपुरा के आदिवासी क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक पकड़ को और मजबूत कर लिया। यह परिणाम राज्य की राजनीति में TMP को एक प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित करता है और यह दिखाता है कि जनजातीय पहचान आधारित राजनीति अब और अधिक प्रभावशाली होती जा रही है।
टिपरा मोथा पार्टी की निर्णायक जीत
पूर्व शाही परिवार से जुड़े प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देबबर्मा के नेतृत्व में TMP ने 30 सदस्यीय परिषद में पूर्ण बहुमत हासिल किया। इस परिषद में 28 सदस्य जनता द्वारा चुने जाते हैं, जबकि दो सदस्यों को राज्य सरकार द्वारा नामित किया जाता है। 2021 के TTAADC चुनाव में TMP ने 18 सीटें जीतकर वाम मोर्चे के लंबे समय से चले आ रहे नियंत्रण को समाप्त किया था। इस बार पार्टी ने 6 अतिरिक्त सीटें जीतकर अपनी स्थिति और मजबूत कर ली। यह जीत दर्शाती है कि आदिवासी क्षेत्रों में TMP की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है।
त्रिपुरा में TTAADC का महत्व
TTAADC त्रिपुरा विधानसभा के बाद राज्य का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक निकाय माना जाता है। इसकी स्थापना 1985 में संविधान की छठी अनुसूची के तहत की गई थी। यह परिषद राज्य के लगभग 10,491 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में से करीब 70 प्रतिशत भूभाग का प्रशासन संभालती है। यह क्षेत्र मुख्य रूप से जनजातीय बहुल है, जहां स्थानीय आदिवासी समुदायों की राजनीतिक भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। त्रिपुरा की 60 सदस्यीय विधानसभा में भी 20 सीटों पर जनजातीय मतदाता निर्णायक प्रभाव रखते हैं। इसलिए TTAADC का राजनीतिक महत्व राज्य की मुख्यधारा की राजनीति से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
भाजपा को बड़ा झटका
भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव में केवल 4 सीटें जीत सकी, जो 2021 में मिली 10 सीटों की तुलना में बड़ी गिरावट है। हालांकि TMP वर्तमान में राज्य सरकार में भाजपा की सहयोगी है, लेकिन TTAADC चुनाव दोनों दलों ने अलग-अलग लड़ा। सीट बंटवारे पर सहमति न बनने के कारण दोनों दलों के बीच चुनावी मुकाबला हुआ। पिछले एक वर्ष में दोनों सहयोगी दलों के समर्थकों के बीच कई राजनीतिक टकराव भी देखने को मिले थे। इस परिणाम ने स्पष्ट कर दिया कि आदिवासी क्षेत्रों में भाजपा की पकड़ कमजोर हुई है, जबकि TMP की स्थिति और मजबूत हुई है।
विपक्षी दल फिर रहे कमजोर
सीपीआई(एम) के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा और कांग्रेस एक बार फिर एक भी सीट जीतने में असफल रहे। 2021 की तरह इस बार भी इन दलों का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। इंडिजिनस पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (IPFT), जो एक अन्य जनजातीय आधारित पार्टी है, भी चुनाव मैदान में थी, लेकिन वह TMP की मजबूत पकड़ को चुनौती नहीं दे सकी। यह परिणाम स्पष्ट करता है कि त्रिपुरा के आदिवासी क्षेत्रों में अब क्षेत्रीय पहचान, स्वायत्तता की मांग और स्थानीय नेतृत्व ही चुनावी सफलता का प्रमुख आधार बन चुके हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- TTAADC की स्थापना वर्ष 1985 में संविधान की छठी अनुसूची के तहत की गई थी।
- छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्त प्रशासनिक व्यवस्था प्रदान करती है।
- त्रिपुरा में 60 सदस्यीय विधानसभा है, जिसमें 20 सीटों पर जनजातीय मतदाता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- त्रिपुरा की लगभग एक-तिहाई आबादी जनजातीय समुदायों से संबंधित है।
टिपरा मोथा पार्टी की यह लगातार दूसरी जीत त्रिपुरा की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। यह स्पष्ट करता है कि जनजातीय क्षेत्रों में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है और स्थानीय पहचान आधारित राजनीति अब निर्णायक भूमिका निभा रही है। आने वाले विधानसभा चुनावों में भी इसका सीधा असर देखने को मिल सकता है, जिससे राज्य की राजनीतिक दिशा और अधिक बदल सकती है।