झारखंड के चार पारंपरिक उत्पादों को मिला जीआई टैग
झारखंड की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और पारंपरिक शिल्पकला को जून 2026 में बड़ी पहचान मिली, जब राज्य के चार विशिष्ट उत्पादों—भागैया सिल्क, कुचाई सिल्क, मुंडा आभूषण और झारखंड बांस शिल्प—को भौगोलिक संकेतक टैग प्रदान किया गया। यह मान्यता इन उत्पादों की भौगोलिक विशिष्टता, पारंपरिक निर्माण तकनीक और सांस्कृतिक महत्व को कानूनी संरक्षण देती है। इससे स्थानीय बुनकरों, शिल्पकारों और ग्रामीण उत्पादक समुदायों के लिए राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय बाजारों के नए अवसर खुलने की संभावना है।
भौगोलिक संकेतक टैग का महत्व
भौगोलिक संकेतक टैग ऐसे उत्पादों को दिया जाता है, जिनकी गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या विशेषताएं किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती हैं। भारत में इसका पंजीकरण भौगोलिक संकेतक वस्तु पंजीकरण एवं संरक्षण अधिनियम, 1999 के अंतर्गत किया जाता है। भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री, उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग के अधीन कार्य करती है। इसका पंजीकरण सामान्यतः दस वर्षों के लिए वैध होता है और निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से इसका नवीनीकरण कराया जा सकता है। यह टैग नकली उत्पादों पर रोक लगाने के साथ वास्तविक उत्पादकों को अपनी क्षेत्रीय पहचान के आधार पर बेहतर मूल्य प्राप्त करने में सहायता करता है।
भागैया और कुचाई सिल्क की विशेषता
भागैया सिल्क झारखंड के गोड्डा जिले के भागैया क्षेत्र से जुड़ा उत्कृष्ट वन्य तसर रेशम है। गोड्डा को झारखंड की रेशम नगरी भी कहा जाता है। तसर रेशम उन रेशमकीटों से प्राप्त होता है, जो जंगलों में पाए जाने वाले अर्जुन, आसन और अन्य वृक्षों की पत्तियों पर पलते हैं। इसकी प्राकृतिक चमक, मजबूती और पारंपरिक बुनाई इसे विशिष्ट बनाती है। कुचाई सिल्क सरायकेला-खरसावां जिले के कुचाई क्षेत्र में तैयार किया जाने वाला वन आधारित तसर रेशम है। इसकी पहचान प्राकृतिक सुनहरी चमक और जनजातीय बुनाई परंपराओं से है। स्थानीय कारीगर पारंपरिक तथा पर्यावरण-अनुकूल विधियों का उपयोग करके इसका उत्पादन करते हैं।
मुंडा आभूषण और बांस शिल्प
मुंडा आभूषण झारखंड के मुंडा जनजातीय समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। हाथ से बनाए जाने वाले इन आभूषणों में ज्यामितीय आकृतियां, धातु शिल्प और समुदाय-विशेष की डिजाइन परंपराएं दिखाई देती हैं। इनका उपयोग विवाह, पर्व और अन्य सामाजिक एवं धार्मिक अवसरों पर किया जाता है। झारखंड बांस शिल्प में छोटानागपुर पठार क्षेत्र में उपलब्ध बांस से घरेलू उपयोग और सजावट की वस्तुएं बनाई जाती हैं। टोकरियां, चटाइयां, पात्र और सजावटी उत्पाद ग्रामीण कारीगरों की रचनात्मकता को प्रदर्शित करते हैं। बांस तेजी से बढ़ने वाली घास है और इसे पर्यावरण-अनुकूल कच्चा माल माना जाता है।
नाबार्ड की भूमिका और बाजार संभावनाएं
इन उत्पादों की विशिष्टताओं के दस्तावेजीकरण और उत्पादक संगठनों के विकास में राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक ने महत्वपूर्ण सहयोग दिया। वर्ष 1982 में स्थापित यह वैधानिक संस्था ग्रामीण ऋण, कृषि विकास और ग्रामीण आजीविका संवर्धन से संबंधित कार्य करती है। भौगोलिक संकेतक मान्यता के बाद इन उत्पादों की ब्रांडिंग, निर्यात प्रोत्साहन, पर्यटन से जुड़ा विपणन और मूल्य संवर्धन किया जा सकता है। इससे पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण होने के साथ कारीगरों की आय और रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- भारत में भौगोलिक संकेतक पंजीकरण वर्ष 1999 के अधिनियम के तहत किया जाता है।
- भौगोलिक संकेतक पंजीकरण दस वर्षों के लिए वैध होता है और इसका नवीनीकरण संभव है।
- तसर एक वन्य रेशम है, जिसे जंगलों के वृक्षों पर पलने वाले रेशमकीटों से प्राप्त किया जाता है।
- छोटानागपुर पठार पूर्वी भारत का प्रमुख भौगोलिक क्षेत्र है, जो जनजातीय संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों के लिए प्रसिद्ध है।
जुलाई 2026 में भारत टेक्स के दौरान झारखंड ने अपने छह भौगोलिक संकेतक प्राप्त हथकरघा उत्पादों को भी प्रदर्शित किया। नई मान्यता से राज्य की पारंपरिक कला को व्यापक बाजार, कानूनी सुरक्षा और वैश्विक पहचान मिलने की उम्मीद है। यह उपलब्धि झारखंड की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कारीगर समुदायों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।