मिशन-02 के जरिए अग्निकुल कॉसमॉस करेगा पुनः उपयोग योग्य रॉकेट तकनीक का परीक्षण

मिशन-02 के जरिए अग्निकुल कॉसमॉस करेगा पुनः उपयोग योग्य रॉकेट तकनीक का परीक्षण

भारत की निजी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी कंपनी अग्निकुल कॉसमॉस अपने मिशन-02 की तैयारी कर रही है, जिसे भारत के निजी क्षेत्र का कक्षीय श्रेणी के पुनः उपयोग योग्य रॉकेट का पहला प्रयास माना जा रहा है। इस मिशन में कंपनी के अग्निबाण प्रक्षेपण यान का उपयोग किया जाएगा। मिशन का प्रमुख उद्देश्य पहले चरण के बूस्टर को नियंत्रित तरीके से वापस लाकर समुद्र से उसकी रिकवरी करना और भविष्य के कम लागत वाले अंतरिक्ष प्रक्षेपणों की दिशा में महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि हासिल करना है।

मिशन-02 और रॉकेट पुनः उपयोग तकनीक

रॉकेट पुनः उपयोग का अर्थ है प्रक्षेपण के बाद रॉकेट के एक या अधिक चरणों को सुरक्षित रूप से वापस प्राप्त कर भविष्य में दोबारा उपयोग करना। यह तकनीक अंतरिक्ष प्रक्षेपण की लागत कम करने और मिशनों को अधिक किफायती बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मिशन-02 में अग्निकुल कॉसमॉस अग्निबाण रॉकेट के पहले चरण के बूस्टर को पृथक होने के बाद नियंत्रित तरीके से पृथ्वी की ओर वापस लाने का परीक्षण करेगी। इसके बाद बूस्टर को समुद्र में सुरक्षित उतारकर पुनः प्राप्त करने का प्रयास किया जाएगा। इसके साथ ही मिशन में पेलोड को कक्षा में स्थापित करने के बाद ऊपरी चरण की विस्तारित कक्षीय क्षमता का भी प्रदर्शन किया जाएगा।

अग्निबाण रॉकेट और परिवर्तनीय ऊपरी चरण

अग्निबाण अग्निकुल कॉसमॉस का छोटा उपग्रह प्रक्षेपण यान है, जिसे निम्न पृथ्वी कक्षा में हल्के उपग्रहों को स्थापित करने के लिए विकसित किया गया है। इसकी सबसे विशेष तकनीक परिवर्तनीय ऊपरी चरण (कन्वर्टिबल अपर स्टेज) है। पेलोड को कक्षा में छोड़ने के बाद भी यह ऊपरी चरण अंतरिक्ष में कार्य करता रह सकता है और विभिन्न कक्षीय अभियानों के लिए एक मंच के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इस अभिनव तकनीक के लिए कंपनी को भारत, अमेरिका और यूरोप में पेटेंट प्राप्त हो चुके हैं।

निवेश, नेतृत्व और लागत में कमी का लक्ष्य

जुलाई 2026 में इसरो के पूर्व अध्यक्ष एस. सोमनाथ अग्निकुल कॉसमॉस के निदेशक मंडल में पर्यवेक्षक (ऑब्जर्वर) के रूप में शामिल हुए। उनके लगभग चार दशकों के अंतरिक्ष कार्यक्रम के अनुभव से कंपनी को तकनीकी और रणनीतिक मार्गदर्शन मिलने की उम्मीद है। कंपनी ने नवंबर 2025 में 1.7 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश जुटाया था, जिसके बाद उसका मूल्यांकन लगभग 50 करोड़ अमेरिकी डॉलर किया गया। अग्निकुल का मानना है कि यदि पुनः उपयोग तकनीक सफल रहती है, तो भविष्य में रॉकेट प्रक्षेपण की लागत 80 प्रतिशत तक कम की जा सकती है। यही कारण है कि पुनः उपयोग योग्य प्रक्षेपण यान आज वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग का प्रमुख लक्ष्य बने हुए हैं।

अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में महत्व

पुनः उपयोग योग्य रॉकेट तकनीक अंतरिक्ष अभियानों को अधिक सुलभ, टिकाऊ और आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाती है। इससे छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण की लागत कम होती है और निजी कंपनियों के लिए अंतरिक्ष बाजार में प्रतिस्पर्धा करना आसान होता है। भारत में निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के विस्तार के साथ ऐसी तकनीकों का विकास देश को वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में मजबूत स्थान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • रॉकेट पुनः उपयोग का अर्थ प्रक्षेपण के बाद रॉकेट के चरणों को पुनः प्राप्त कर दोबारा उपयोग करना है।
  • समुद्री रिकवरी नियंत्रित अवतरण के बाद रॉकेट बूस्टर को समुद्र से वापस प्राप्त करने की प्रक्रिया है।
  • इसरो (आईएसआरओ) भारत की राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी है।
  • छोटे उपग्रह प्रक्षेपण यान हल्के पेलोड को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने के लिए विकसित किए जाते हैं।

अग्निकुल कॉसमॉस का मिशन-02 भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है। यदि यह मिशन सफल होता है, तो पुनः उपयोग योग्य रॉकेट तकनीक, कम प्रक्षेपण लागत और उन्नत कक्षीय संचालन के क्षेत्र में भारत की क्षमता को नई पहचान मिलेगी तथा देश की अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी को वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने में सहायता मिलेगी।

Originally written on July 16, 2026 and last modified on July 16, 2026.

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