मेघालय में मिली नई मशरूम प्रजाति से बढ़ी भारत की फंगल विविधता

मेघालय में मिली नई मशरूम प्रजाति से बढ़ी भारत की फंगल विविधता

मेघालय से मशरूम की एक नई प्रजाति Russula griseopurpurata का वैज्ञानिक वर्णन किया गया है। यह खोज भारत की फंगल विविधता को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है, क्योंकि यह प्रजाति Russula वंश की है, जिसमें दुनिया भर में लगभग 2,000 प्रजातियाँ शामिल हैं। इस नई प्रजाति का विवरण गौहाटी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 5 अगस्त 2026 को वैज्ञानिक पत्रिका Phytotaxa में प्रकाशित किया।

मेघालय से मिली पहचान और नमूने की खासियत

इस प्रजाति का होलोटाइप नमूना 22 जुलाई 2022 को मेघालय के री भोई जिले के जिरांग क्षेत्र में डॉ. निरंजन रॉय ने एकत्र किया था। यह नमूना Shorea robusta यानी साल के पेड़ के नीचे, लगभग 320 मीटर की ऊँचाई पर मिला। वैज्ञानिक अध्ययन में इस प्रजाति के कुल तीन नमूनों की जाँच की गई, जिनमें दो पश्चिम बंगाल और एक मेघालय से था।

मेघालय वाला नमूना संग्रह संख्या GUBH 20331 और अनुक्रम PQ432811 के तहत दर्ज किया गया। शोधकर्ताओं ने इसकी पहचान के लिए ITS DNA sequencing और phylogenetic analysis जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया।

रूप-रंग और वर्गीकरण में क्या मिला

Russula griseopurpurata को Russula subsect. Cyanoxanthinae के भीतर एक नई टैक्सोनॉमिक इकाई के रूप में पहचाना गया है। इस मशरूम की सबसे प्रमुख पहचान इसका धूसर-बैंगनी टोपीनुमा भाग है, जो उम्र बढ़ने पर दरारें दिखाता है। इसके गलफड़ों में डंठल के पास शाखाएँ या फॉर्किंग भी देखी गईं।

इन्हीं बाहरी लक्षणों के साथ आणविक यानी DNA आधारित साक्ष्यों ने इसे संबंधित प्रजातियों से अलग साबित किया। मशरूम वर्गीकरण में ऐसे अध्ययन इसलिए अहम होते हैं, क्योंकि कई प्रजातियाँ देखने में काफी मिलती-जुलती होती हैं और केवल सूक्ष्म या आनुवंशिक अंतर से अलग पहचानी जाती हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • Phytotaxa एक वैज्ञानिक पत्रिका है, जिसमें पौधों और फफूंदों की टैक्सोनॉमी से जुड़े शोध प्रकाशित होते हैं।
  • होलोटाइप वह एकल नमूना होता है, जिसे किसी नई प्रजाति के नामकरण का आधार माना जाता है।
  • ITS का पूरा नाम Internal Transcribed Spacer है और यह फफूंदों की पहचान में एक मानक DNA मार्कर है।
  • Shorea robusta को सामान्यतः साल कहा जाता है और यह भारतीय उपमहाद्वीप का प्रमुख वृक्ष है।

भारत में फंगल अध्ययन के लिए क्यों अहम है यह खोज

भारत में फफूंदों की पहचान अब केवल बाहरी लक्षणों पर नहीं, बल्कि सूक्ष्म संरचना और DNA विश्लेषण के संयोजन से की जा रही है। इससे नई प्रजातियों को अधिक सटीकता से दर्ज किया जा सकता है और समान दिखने वाली प्रजातियों के बीच भ्रम कम होता है। Russula वंश की कुछ प्रजातियाँ खाने योग्य होती हैं, लेकिन Russula griseopurpurata के मानव उपभोग के लिए सुरक्षित होने की पुष्टि अभी नहीं की गई है।

यह खोज बताती है कि पूर्वोत्तर भारत, खासकर मेघालय जैसे जैव-विविध क्षेत्रों में अभी भी कई फंगल प्रजातियाँ वैज्ञानिक पहचान की प्रतीक्षा में हैं। ऐसे अध्ययन देश की जैव-विविधता सूची को समृद्ध करने के साथ-साथ संरक्षण और पारिस्थितिकी अनुसंधान के लिए भी आधार तैयार करते हैं।

Originally written on August 10, 2026 and last modified on August 10, 2026.

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