शून्य खुराक का चक्रव्यूह: विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट और भारत के लाखों बच्चों की सेहत का सच
मेडिकल साइंस की दुनिया में एक शब्द इन दिनों बहुत चर्चा में है—’जीरो-डोज’ यानी शून्य खुराक। यह उन बच्चों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जिन्हें अपने जीवन के पहले साल में एक भी बुनियादी टीका नहीं मिल पाता। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और यूनिसेफ (UNICEF) की संयुक्त रिपोर्ट ने दुनिया के सामने एक ऐसा आंकड़ा रखा है, जिसने भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में एक नई बहस छेड़ दी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में भारत में करीब 6,79,000 बच्चे ऐसे थे, जो जीवन रक्षक टीकों की एक भी खुराक हासिल नहीं कर पाए। यह आंकड़ा एक तरफ तो हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि डिजिटल इंडिया और आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के इस दौर में भी लाखों बच्चे बुनियादी सुरक्षा से दूर क्यों हैं, वहीं दूसरी तरफ यह भारत की एक बड़ी कामयाबी की कहानी भी बयां करता है। दरअसल, पहली नजर में छह लाख से ज्यादा की यह संख्या डराने वाली लग सकती है, लेकिन इसके पीछे की असली कहानी भारत के हेल्थकेयर सिस्टम की एक बड़ी जीत की गवाह है।
छह लाख का यह आंकड़ा खतरे की घंटी है या बड़ी कामयाबी?
अगर हम इस आंकड़े की गहराई में जाएं, तो पता चलता है कि भारत ने इस मोर्चे पर असाधारण प्रगति की है। साल 2024 में भारत में शून्य खुराक वाले बच्चों की संख्या लगभग 9,09,000 थी। सिर्फ एक साल के भीतर भारत सरकार के विशेष अभियानों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की कड़ी मेहनत के दम पर इस संख्या में भारी गिरावट आई है और यह घटकर 6,79,000 पर पहुंच गई है। इससे भी बड़ी बात यह है कि साल 2023 में यह संख्या 15,92,000 के खतरनाक स्तर पर थी। इस जबरदस्त सुधार का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि साल 2001 में जब से यह वैश्विक रिपोर्ट प्रकाशित होना शुरू हुई है, तब से लेकर अब तक के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब भारत खसरे (मीजल्स) के खिलाफ टीका न पाने वाले बच्चों की सूची में दुनिया के शीर्ष 10 देशों से बाहर हो गया है। आज भारत के 95 प्रतिशत बच्चे डिप्थीरिया, टिटनेस और परटुसिस (DTP3) के साथ-साथ खसरे की दूसरी खुराक से पूरी तरह सुरक्षित हो चुके हैं। यह सफलता इस बात का सबूत है कि सही दिशा में उठाए गए कदम कैसे लाखों जिंदगियों को सुरक्षित बना सकते हैं।

कौन हैं ये बच्चे और क्यों छूट जाती है सुरक्षा की पहली खुराक?
विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि जो बच्चे इस सुरक्षा चक्र से बाहर रह जाते हैं, वे किसी खास भौगोलिक या सामाजिक दायरे में सिमटे हुए हैं। भारत में बड़े पैमाने पर चलने वाले टीकाकरण अभियानों के बावजूद इन छह लाख से अधिक बच्चों तक न पहुंच पाने के पीछे कई जटिल सामाजिक और आर्थिक कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है शहरी स्लम (झुग्गी-झोपड़ियां) और प्रवासी आबादी। निर्माण कार्यों, ईंट-भट्टों या मौसमी मजदूरी के लिए एक राज्य से दूसरे राज्य में लगातार पलायन करने वाले परिवारों के बच्चे अक्सर इस सिस्टम से छूट जाते हैं। जब तक एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता किसी परिवार का डेटा तैयार करता है, तब तक वह परिवार रोजगार की तलाश में किसी दूसरे शहर की तरफ कूच कर चुका होता है। इसके अलावा देश के सुदूर पहाड़ी इलाके, घने जंगल और आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी स्वास्थ्य केंद्रों की कमी भी एक बड़ी बाधा रही है। एक और गंभीर समस्या है ‘वैक्सीन हेजिटेंसी’ यानी टीकों को लेकर फैला भ्रम और डर। आज भी ग्रामीण और अशिक्षित इलाकों में टीकों के साइड इफेक्ट्स को लेकर तरह-तरह की अफवाहें उड़ती हैं। कई समुदायों में धार्मिक या पारंपरिक मान्यताओं के चलते लोग अपने बच्चों को टीका लगवाने से कतराते हैं। इन मानसिक और भौगोलिक दीवारों को तोड़ना आज भी हमारे स्वास्थ्य तंत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।
नियमों और अभियानों की वह रणनीति जिसने बदली तस्वीर
भारत सरकार ने इस चुनौती से निपटने के लिए किसी एक ढर्रे पर काम करने के बजाय बहुआयामी रणनीति अपनाई। स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश के उन 143 जिलों की पहचान की, जहां बिना टीके वाले बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा थी। इन इलाकों के लिए विशेष तौर पर ‘जीरो-डोज इम्प्लीमेंटेशन प्लान’ तैयार किया गया। इस रणनीति के तहत आशा (ASHA) और एएनएम (ANM) कार्यकर्ताओं को ग्राउंड लेवल पर बड़ी जिम्मेदारी दी गई। इन कार्यकर्ताओं ने न केवल घर-घर जाकर बच्चों की मैपिंग की, बल्कि स्थानीय भाषाओं में लोगों को समझाकर उनके मन से टीकों का डर भी दूर किया। भारत के यूनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम (UIP) के तहत हर साल लगभग 2.6 करोड़ शिशुओं और 2.9 करोड़ गर्भवती महिलाओं को बिल्कुल मुफ्त टीके उपलब्ध कराए जाते हैं। साल 2013 तक इस कार्यक्रम में केवल 6 बीमारियों के टीके शामिल थे, लेकिन आज इसमें रोटावायरस, न्यूमोकोकल और मीजल्स-रुबेला जैसी 12 जानलेवा बीमारियों के टीके शामिल हैं। इसी आक्रामक नीति का नतीजा है कि शून्य खुराक वाले बच्चों का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा है।
वैश्विक स्तर पर कहां खड़ा है भारत?
अगर वैश्विक परिदृश्य की बात करें, तो पूरी दुनिया में स्थिति बहुत ज्यादा संतोषजनक नहीं है। साल 2025 में पूरी दुनिया में लगभग 1.35 करोड़ बच्चे ऐसे थे जिन्हें एक भी टीका नहीं मिला। भले ही यह संख्या पिछले साल के मुकाबले साढ़े सात लाख कम है, लेकिन डब्ल्यूएचओ का कहना है कि वैश्विक टीकाकरण की रफ्तार कोविड-19 महामारी से पहले के स्तर पर नहीं लौट पाई है। दुनिया भर में सुरक्षा चक्र से बाहर रहने वाले आधे से ज्यादा बच्चे ऐसे देशों में रहते हैं जो युद्ध, राजनीतिक अस्थिरता या भीषण गरीबी से जूझ रहे हैं। इस वैश्विक संकट के बीच भारत की स्थिति एक मिसाल की तरह है। भारत की विशाल आबादी को देखते हुए छह लाख की संख्या कुल आबादी का महज 0.06 प्रतिशत है। संयुक्त राष्ट्र की बाल मृत्यु दर अनुमान रिपोर्ट ने भी माना है कि भारत ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर एक बेंचमार्क स्थापित किया है। भारत को इसकी प्रतिबद्धता के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ‘मीजल्स एंड रुबेला चैंपियन अवॉर्ड’ से भी नवाजा जा चुका है।
अधूरी खुराक का नया खतरा और आगे की राह
इस पूरी रिपोर्ट में एक और पहलू है जिस पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। वह है ‘ड्रॉप-आउट’ बच्चे, यानी वे बच्चे जिन्होंने पहला टीका तो लगवा लिया, लेकिन किसी वजह से तीन खुराकों का अपना पूरा कोर्स मुकम्मल नहीं कर पाए। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, दुनिया भर में लाखों बच्चे ऐसे हैं जो पहला टीका लेने के बाद स्वास्थ्य तंत्र की नजरों से ओझल हो जाते हैं। भारत में भी इस अंतर को पाटना एक बड़ी चुनौती है क्योंकि अधूरा टीकाकरण बच्चे को पूरी सुरक्षा नहीं देता और खसरे जैसी अत्यधिक संक्रामक बीमारियों के फैलने का खतरा हमेशा बना रहता है। आने वाले समय में भारत का लक्ष्य इस 6,79,000 की संख्या को शून्य पर लाना है। इसके लिए तकनीक का सहारा लिया जा रहा है, जिसमें डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम के जरिए गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों के टीकाकरण का पूरा रिकॉर्ड ऑनलाइन रखा जा रहा है। जब तक देश का आखिरी बच्चा इस सुरक्षा चक्र के दायरे में नहीं आ जाता, तब तक संक्रामक बीमारियों के खिलाफ यह जंग अधूरी रहेगी। लेकिन जिस रफ्तार और इच्छाशक्ति से भारत ने पिछले तीन सालों में इस संख्या को 15 लाख से घटाकर 6 लाख के पास पहुंचाया है, वह यह उम्मीद जगाता है कि आने वाले सालों में भारत पूरी तरह से ‘जीरो-डोज’ मुक्त देश बनने की राह पर अग्रसर है।