नीट परीक्षा के बीच बड़ी खुशखबरी: देश में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचीं एमबीबीएस सीटें
डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले देश के लाखों युवाओं के लिए एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर आई है। हर साल नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट यानी नीट (NEET-UG) की परीक्षा में 22 लाख से ज्यादा छात्र बैठते हैं। गलाकाट प्रतिस्पर्धा और सीमित सीटों की वजह से महज कुछ अंकों से चूक जाने वाले हजारों प्रतिभावान छात्रों का सपना हर साल टूट जाता था। लेकिन अब सरकार और नेशनल मेडिकल कमिशन (NMC) ने मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। देश में मेडिकल की पढ़ाई को एक नए मुकाम पर ले जाते हुए शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए एमबीबीएस (MBBS) की सीटों में करीब 10,000 नई सीटों की भारी बढ़ोतरी को मंजूरी दी गई है। इस फैसले के बाद भारत में कुल अंडरग्रेजुएट मेडिकल सीटों की संख्या बढ़कर 1,36,939 के ऑल-टाइम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। सीटों में हुआ यह इजाफा न सिर्फ सरकारी और प्राइवेट कॉलेजों में दाखिले की राह आसान करेगा, बल्कि आने वाले सालों में देश की स्वास्थ्य व्यवस्था का चेहरा भी बदल देगा।
क्या है नया सीट मैट्रिक्स और कहां खुलीं कितनी सीटें?
नेशनल मेडिकल कमिशन (NMC) के मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड (MARB) द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस साल कुल 9,911 नई सीटें जोड़ी गई हैं। इन नई सीटों को देश के 823 मान्यता प्राप्त मेडिकल कॉलेजों में बांटा गया है, जिनमें 441 सरकारी और 382 प्राइवेट संस्थान शामिल हैं। इस आंकड़े में एम्स (AIIMS) और जिपमेर (JIPMER) जैसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों की सीटें शामिल नहीं हैं, यानी उनके अलावा यह एक बहुत बड़ा पूल तैयार हुआ है। इस साल की बढ़ोतरी में एक दिलचस्प पहलू यह है कि 25 नए मेडिकल कॉलेज खोले गए हैं, जिनमें 7 सरकारी और 18 प्राइवेट कॉलेज शामिल हैं। अकेले इन नए कॉलेजों से 2,400 सीटों का इजाफा हुआ है, जबकि बाकी बची 7,511 सीटें पहले से चल रहे मौजूदा मेडिकल कॉलेजों में क्षमता बढ़ाकर तैयार की गई हैं। राज्यों के हिसाब से देखें तो इस बार भी दक्षिण भारत के राज्यों का दबदबा बरकरार है, लेकिन उत्तर और पश्चिम भारत के राज्यों में भी सीटों में जबरदस्त उछाल देखा गया है।

इन राज्यों को मिला सबसे बड़ा फायदा
सीटों के इस नए गणित में कुछ राज्यों की लॉटरी लग गई है। अगर आप नीट की तैयारी कर रहे हैं, तो इन राज्यों के सीट मैट्रिक्स में बदलाव आपके लिए बेहद काम का साबित हो सकता है:

कर्नाटक और तमिलनाडु
इस साल सबसे बड़ी बढ़त कर्नाटक को मिली है, जहां कुल 1,300 नई सीटें जुड़ी हैं। इसके साथ ही कर्नाटक 15,395 सीटों के साथ देश में सबसे आगे बना हुआ है। तमिलनाडु भी पीछे नहीं है, वहां 950 नई सीटें जोड़ी गई हैं, जिससे राज्य में कुल सीटें लगभग 14,000 के करीब पहुंच गई हैं।
उत्तर प्रदेश और राजस्थान
हिंदी बेल्ट के छात्रों के लिए उत्तर प्रदेश से बड़ी खबर है, जहां प्राइवेट और सरकारी क्षेत्रों को मिलाकर कुल सीटों की संख्या अब 14,000 को छू रही है। वहीं राजस्थान में भी 900 नई सीटों को मंजूरी मिली है, जिससे वहां कुल क्षमता बढ़कर 8,080 हो गई है।
तेलंगाना और महाराष्ट्र
तेलंगाना ने इस साल 810 नई सीटें जोड़कर 10,250 सीटों का आंकड़ा पार कर लिया है। महाराष्ट्र भी इस रेस में पीछे नहीं रहा और 400 नई सीटों के साथ अब वहां कुल क्षमता 13,099 सीटों की हो चुकी है।
नियमों में वह बदलाव, जिसने रातों-रात बदल दी तस्वीर
अब सवाल यह उठता है कि अचानक एक ही साल में इतनी सारी सीटें कैसे बढ़ गईं? इसके पीछे एनएमसी के नियमों में किया गया एक बड़ा प्रशासनिक बदलाव है। दरअसल, एनएमसी के ‘ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन रेगुलेशंस 2023’ के तहत पुराने और कड़े नियमों को लचीला बनाया गया है। पुराने नियमों के मुताबिक, कोई भी मेडिकल कॉलेज अपनी एमबीबीएस सीटें बढ़ाने के लिए तब तक आवेदन नहीं कर सकता था, जब तक कि उसके पहले बैच के छात्रों की 4.5 से 5 साल की पढ़ाई पूरी न हो जाए। इस पाबंदी की वजह से नए कॉलेजों में इंफ्रास्ट्रक्चर होने के बावजूद सालों तक सीटें सीमित रहती थीं। नए नियमों में इस पाबंदी को पूरी तरह हटा दिया गया है। अब कोई भी मान्यता प्राप्त मेडिकल कॉलेज अपने दूसरे साल से ही सीटों की संख्या बढ़ाने की मांग कर सकता है, बशर्ते वह सरकार के तय मानकों और गुणवत्ता पर खरा उतरता हो। इसी बदलाव का नतीजा है कि इस साल इतनी बड़ी संख्या में सीटें अपग्रेड हो सकी हैं।
नीट कट-ऑफ और काउंसलिंग पर क्या होगा असर?
10,000 नई सीटों के आने का सीधा असर इस साल होने वाली नीट-यूजी की काउंसलिंग पर पड़ने वाला है। मेडिकल एक्सपर्ट्स का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में सीटें बढ़ने से ऑल इंडिया कोटा (AIQ) और स्टेट कोटा, दोनों की ही क्लोजिंग रैंक में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। आसान शब्दों में कहें तो, जो छात्र पिछले सालों के ट्रेंड के हिसाब से महज कुछ रैंक या नंबरों से सरकारी या अच्छे प्राइवेट कॉलेजों से चूक जाते थे, उनके लिए इस बार मेडिकल कॉलेज की दहलीज पार करने के मौके काफी बढ़ जाएंगे। हालांकि, एनएमसी ने साफ चेतावनी दी है कि कोई भी कॉलेज तय क्षमता से एक भी सीट ज्यादा पर एडमिशन नहीं देगा, और ऐसा करने पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा।
भारत के हेल्थकेयर सिस्टम के लिए इसके क्या मायने हैं?
इस बड़े फैसले का असर सिर्फ छात्रों के करियर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के हर नागरिक की सेहत से जुड़ा मामला है। भारत जैसे 140 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले देश में हमेशा से डॉक्टरों की कमी एक बड़ा मुद्दा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक हर 1,000 की आबादी पर कम से कम एक डॉक्टर होना जरूरी है। भारत सरकार के ताजा अनुमानों के मुताबिक, देश में अब डॉक्टर-आबादी का अनुपात सुधरकर 1:811 हो चुका है, जो वैश्विक मानक से भी बेहतर है। सीटों की यह बढ़ोतरी ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों तक आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में रीढ़ की हड्डी साबित होगी। जब देश में हर साल ज्यादा डॉक्टर पढ़कर निकलेंगे, तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर बड़े सरकारी अस्पतालों तक डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ेगी, जिससे आम आदमी को इलाज के लिए बड़े शहरों की तरफ नहीं भागना पड़ेगा।
भारत में मेडिकल शिक्षा का बदलता चेहरा
पिछले एक दशक में भारत के मेडिकल एजुकेशन सेक्टर में क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। साल 2013-14 में जहां देश में सिर्फ 387 मेडिकल कॉलेज हुआ करते थे, वहीं आज इनकी संख्या दोगुनी से ज्यादा होकर 800 के पार जा चुकी है। इस दौरान अंडरग्रेजुएट सीटों में 140% से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सरकार का लक्ष्य अगले कुछ सालों में देश में कुल मेडिकल सीटों की संख्या में 75,000 से ज्यादा सीटों का और इजाफा करना है, जिसके लिए फेज-वार तरीके से 15,000 करोड़ रुपये से अधिक का बजट निवेश किया जा रहा है। मेडिकल शिक्षा का यह विस्तार न केवल देश के भीतर स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारेगा, बल्कि भारत को दुनिया भर के लिए एक किफायती और बेहतरीन मेडिकल हब के रूप में स्थापित करने में भी मदद करेगा।