एमएसएमई ऋण विस्तार के लिए डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर आरबीआई का जोर
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (एमएसएमई) को अधिक और तेज़ ऋण उपलब्ध कराने के लिए बैंकों तथा गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) का व्यापक उपयोग करने की सलाह दी है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने 22 जून 2026 को अंतरराष्ट्रीय एमएसएमई दिवस से पहले कोच्चि में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान यह बात कही। उनका मानना है कि डिजिटल प्रणालियों के प्रभावी उपयोग से छोटे उद्यमों तक ऋण पहुंच को अधिक सरल, पारदर्शी और सुलभ बनाया जा सकता है।
डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की भूमिका
डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर ऐसे साझा डिजिटल ढांचे को कहा जाता है जो पहचान सत्यापन, भुगतान, डेटा विनिमय और सेवाओं की डिलीवरी को बड़े स्तर पर सक्षम बनाता है। भारत में विकसित डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने वित्तीय समावेशन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। एमएसएमई ऋण वितरण के संदर्भ में आरबीआई ने अकाउंट एग्रीगेटर फ्रेमवर्क, यूनिफाइड लेंडिंग इंटरफेस, ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम, जीएसटी डेटा ट्रेल और आधार-आधारित प्रमाणीकरण जैसी प्रणालियों को विशेष रूप से महत्वपूर्ण बताया है। ये सभी डिजिटल उपकरण ऋण प्रक्रिया को अधिक कुशल और डेटा-आधारित बनाते हैं।
अकाउंट एग्रीगेटर और डिजिटल ऋण मंच
अकाउंट एग्रीगेटर फ्रेमवर्क भारत की वित्तीय डेटा संरचना का एक सहमति-आधारित डेटा साझाकरण तंत्र है। इसके माध्यम से वित्तीय जानकारी सुरक्षित तरीके से साझा की जाती है, जिससे ऋणदाताओं को आवेदक की वित्तीय स्थिति का बेहतर आकलन करने में सहायता मिलती है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान इस प्रणाली के माध्यम से लगभग 3.5 ट्रिलियन रुपये के ऋण वितरण को सुविधा मिली। आरबीआई का मानना है कि डिजिटल ऋण क्षेत्र में इस मंच की संभावनाएं अभी और अधिक बढ़ सकती हैं। यूनिफाइड लेंडिंग इंटरफेस एक मानकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो ऋण प्राप्ति की प्रक्रिया को सरल बनाता है। वहीं ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम एक इलेक्ट्रॉनिक मंच है, जहां एमएसएमई अपने चालानों के आधार पर शीघ्र वित्तीय सहायता प्राप्त कर सकते हैं।
एमएसएमई क्षेत्र और सरकारी योजनाएं
भारत की अर्थव्यवस्था में एमएसएमई क्षेत्र रोजगार सृजन, उत्पादन और निर्यात के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। 31 दिसंबर 2025 तक अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों द्वारा एमएसएमई क्षेत्र को दिया गया कुल बकाया ऋण 36.79 ट्रिलियन रुपये तक पहुंच गया था। आरबीआई ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों से प्राथमिकता क्षेत्र ऋण, मुद्रा योजना, पीएम-स्वनिधि, पीएम विश्वकर्मा तथा सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के लिए क्रेडिट गारंटी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में तेजी लाने का भी आग्रह किया है। इन योजनाओं का उद्देश्य छोटे उद्यमों को सस्ती और सुलभ वित्तीय सहायता प्रदान करना है।
एमएसएमई पंजीकरण और नीति ढांचा
भारत में एमएसएमई की श्रेणीकरण व्यवस्था सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 के अंतर्गत निर्धारित की गई है। इस क्षेत्र को विशेष वित्तीय सहायता, ऋण गारंटी और पंजीकरण संबंधी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। उद्यम पंजीकरण प्रणाली एमएसएमई के लिए आधिकारिक पंजीकरण मंच है, जिसके माध्यम से उद्यमी विभिन्न सरकारी योजनाओं और लाभों तक पहुंच प्राप्त कर सकते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार से इन सुविधाओं का लाभ अधिक उद्यमियों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- अकाउंट एग्रीगेटर फ्रेमवर्क भारत में सहमति-आधारित वित्तीय डेटा साझा करने की प्रणाली है।
- ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम का उपयोग चालान छूट और प्राप्य वित्तपोषण के लिए किया जाता है।
- प्राथमिकता क्षेत्र ऋण व्यवस्था के अंतर्गत कृषि, एमएसएमई और कमजोर वर्गों को विशेष महत्व दिया जाता है।
- मुद्रा (MUDRA) का पूरा नाम माइक्रो यूनिट्स डेवलपमेंट एंड रिफाइनेंस एजेंसी है।
आरबीआई द्वारा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के उपयोग पर दिया गया जोर भारत के एमएसएमई क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करता है। डिजिटल तकनीकों के माध्यम से ऋण प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, तेज और समावेशी बनाया जा सकता है। इससे छोटे उद्यमों को वित्तीय संसाधनों तक बेहतर पहुंच मिलेगी और देश की आर्थिक वृद्धि को भी नई गति प्राप्त होगी।