एफएसएसएआई ने भ्रामक खाद्य दावों पर कड़ा रुख अपनाया, कई कंपनियों को जारी किए नोटिस
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने जून 2026 में पैकेज्ड खाद्य उत्पादों पर किए जा रहे कुछ दावों और ब्रांड नामों को लेकर खाद्य व्यवसाय संचालकों को नोटिस जारी किए हैं। “हेल्दी”, “ऑर्गेनिक”, “जीरो मैदा”, “ट्रू विटामिन” और “प्लांट-बेस्ड वीगन” जैसे दावों की जांच की जा रही है, क्योंकि इनसे उपभोक्ताओं के बीच उत्पाद की प्रकृति को लेकर भ्रामक धारणा बन सकती है। यह कार्रवाई खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत की गई है, जो भारत में खाद्य सुरक्षा और लेबलिंग का प्रमुख कानून है।
खाद्य लेबलिंग का कानूनी ढांचा
भारत में खाद्य उत्पादों की लेबलिंग और विज्ञापन से संबंधित नियम खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के अंतर्गत बनाए गए हैं। एफएसएसएआई इस कानून के तहत खाद्य संरचना, लेबलिंग, विज्ञापन और उत्पादों पर किए जाने वाले दावों के लिए मानक निर्धारित करता है। खाद्य सुरक्षा और मानक (लेबलिंग एवं प्रदर्शन) विनियमों के अनुसार किसी भी खाद्य उत्पाद के बारे में दी गई जानकारी सत्य, स्पष्ट और उपभोक्ताओं को भ्रमित न करने वाली होनी चाहिए। यदि कोई ब्रांड नाम या व्यापारिक नाम किसी उत्पाद की वास्तविक प्रकृति के बारे में गलत धारणा उत्पन्न करता है, तो उस पर नियामक कार्रवाई की जा सकती है।
किन दावों पर उठे सवाल?
एफएसएसएआई ने “हेल्दी”, “जीरो मैदा”, “ट्रू विटामिन” और “प्लांट-बेस्ड वीगन” जैसे दावों की जांच शुरू की है। इन शब्दों का उपयोग अक्सर विपणन (मार्केटिंग) के उद्देश्य से किया जाता है, लेकिन यदि इनके समर्थन में नियामकीय मान्यता या वैज्ञानिक आधार उपलब्ध नहीं है, तो इन्हें भ्रामक माना जा सकता है। विशेष रूप से “जीरो मैदा” दावे वाले कुछ उत्पादों में गेहूं का आटा और गेहूं ग्लूटेन जैसे अवयव पाए गए, जिससे ऐसे दावों की सत्यता पर प्रश्न उठे हैं।
“ट्रू विटामिन” दावे पर आपत्ति
एफएसएसएआई ने “ट्रू विटामिन” शब्द के उपयोग पर भी सवाल उठाया है। नियामक के अनुसार यह शब्द वर्तमान खाद्य नियमों में परिभाषित या मान्यता प्राप्त नहीं है। इसलिए इसका उपयोग उपभोक्ताओं को उत्पाद के पोषण संबंधी गुणों के बारे में भ्रमित कर सकता है।
ऑर्गेनिक उत्पादों के लिए नियम
भारत में ऑर्गेनिक खाद्य उत्पादों के लिए निर्धारित प्रमाणन प्रणालियां मौजूद हैं। इनमें राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (NPOP) और सहभागी गारंटी प्रणाली (PGS) प्रमुख हैं। यदि कोई उत्पाद इन प्रमाणन मानकों को पूरा करता है, तभी उसे प्रमाणित ऑर्गेनिक उत्पाद के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। ऐसे प्रमाणित उत्पादों पर ‘जैविक भारत’ (Jaivik Bharat) लोगो का उपयोग किया जाता है। बिना आवश्यक प्रमाणन के “ऑर्गेनिक” शब्द का उपयोग करने पर एफएसएसएआई कार्रवाई कर सकता है।
वीगन और प्लांट-बेस्ड लेबलिंग
“प्लांट-बेस्ड” और “वीगन” जैसे दावे भी नियामकीय जांच के दायरे में हैं। यदि कोई उत्पाद बिना आवश्यक स्वीकृति या निर्धारित मानकों का पालन किए स्वयं को वीगन या प्रमाणित प्लांट-बेस्ड बताता है, तो इसे भ्रामक प्रस्तुति माना जा सकता है। एफएसएसएआई के लाइसेंस और लेबलिंग नियमों के अनुसार ऐसे दावों के लिए विशेष अनुपालन आवश्यक हो सकता है।
संभावित दंडात्मक कार्रवाई
एफएसएसएआई के पास खाद्य व्यवसाय संचालकों को लेबल सुधारने, भ्रामक दावों को हटाने और नियमों का पालन सुनिश्चित करने का अधिकार है। यदि कोई संस्था निर्धारित नियमों का पालन नहीं करती है, तो उसके खिलाफ आर्थिक दंड, उत्पाद वापस मंगाने (रिकॉल) या लाइसेंस निलंबन जैसी कार्रवाई की जा सकती है।
उपभोक्ता हितों की सुरक्षा
खाद्य लेबलिंग से संबंधित नियमों का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं को सही और पारदर्शी जानकारी उपलब्ध कराना है। स्पष्ट लेबलिंग और सत्य दावों के माध्यम से उपभोक्ता बेहतर निर्णय ले सकते हैं तथा भ्रामक विज्ञापन और विपणन से बच सकते हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- एफएसएसएआई की स्थापना खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत की गई थी।
- खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 भारत का प्रमुख खाद्य सुरक्षा कानून है।
- राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (NPOP) भारत की ऑर्गेनिक प्रमाणन प्रणाली है।
- सहभागी गारंटी प्रणाली (PGS) छोटे उत्पादकों के लिए जैविक प्रमाणन का एक ढांचा है।
- ‘जैविक भारत’ लोगो प्रमाणित ऑर्गेनिक खाद्य उत्पादों पर उपयोग किया जाता है।
- खाद्य लेबलों पर भ्रामक दावों के लिए एफएसएसएआई दंडात्मक कार्रवाई कर सकता है।
- वीगन और प्लांट-बेस्ड दावों के लिए निर्धारित लेबलिंग मानकों का पालन आवश्यक है।
एफएसएसएआई की यह कार्रवाई खाद्य उत्पादों की लेबलिंग में पारदर्शिता और उपभोक्ता संरक्षण को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। सही जानकारी और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित दावों को बढ़ावा देकर नियामक यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उपभोक्ता किसी भी खाद्य उत्पाद का चयन करते समय भ्रमित न हों और उन्हें उत्पाद की वास्तविक गुणवत्ता और विशेषताओं की स्पष्ट जानकारी प्राप्त हो।