आरबीआई ने ब्याज दर बढ़ाने की अटकलों को बताया समय से पहले
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने 24 जून 2026 को कहा कि फिलहाल ब्याज दरों में बढ़ोतरी की चर्चा करना जल्दबाजी होगी। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने 5 जून 2026 को रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखने का निर्णय लिया था। गवर्नर ने स्पष्ट किया कि वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए केंद्रीय बैंक की नीति संतुलित और तटस्थ बनी हुई है।
रेपो दर क्या होती है?
रेपो दर वह ब्याज दर है जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को सरकारी प्रतिभूतियों के बदले अल्पकालिक ऋण प्रदान करता है। यह आरबीआई की मौद्रिक नीति का सबसे महत्वपूर्ण उपकरण माना जाता है। जब रेपो दर बढ़ाई जाती है तो बैंकों के लिए ऋण लेना महंगा हो जाता है, जिससे बाजार में धन की उपलब्धता कम होती है। वहीं रेपो दर में कमी से ऋण सस्ता होता है और आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलता है। इसी कारण रेपो दर का सीधा प्रभाव ऋण, निवेश और उपभोक्ता खर्च पर पड़ता है।
मौद्रिक नीति समिति का निर्णय
आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति ने सर्वसम्मति से रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर बनाए रखने का निर्णय लिया। यह निर्णय फरवरी 2025 से अब तक कुल 1 प्रतिशत की दर कटौती के बाद लिया गया है। गवर्नर ने मौद्रिक नीति के वर्तमान रुख को “तटस्थ” बताया। तटस्थ नीति का अर्थ है कि केंद्रीय बैंक भविष्य में आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार दरों में वृद्धि या कमी दोनों विकल्प खुले रखता है। इससे बाजार को संकेत मिलता है कि फिलहाल आरबीआई किसी एक दिशा में आक्रामक कदम उठाने के पक्ष में नहीं है।
विकास और मुद्रास्फीति के अनुमान
मौद्रिक नीति समिति ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए भारत की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर का अनुमान 6.9 प्रतिशत से घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया है। यह संकेत देता है कि आर्थिक वृद्धि की गति अपेक्षाकृत धीमी रहने की संभावना है। दूसरी ओर, मुद्रास्फीति का अनुमान बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत कर दिया गया है, जो पहले 4.6 प्रतिशत था। महंगाई के बढ़ते अनुमान का मुख्य कारण वैश्विक और घरेलू दोनों प्रकार के जोखिम माने जा रहे हैं। आरबीआई उपभोक्ता मूल्य सूचकांक, खाद्य वस्तुओं की कीमतों, ईंधन लागत और कोर मुद्रास्फीति जैसे संकेतकों पर लगातार नजर रखता है।
महंगाई को प्रभावित करने वाले बाहरी कारक
आरबीआई गवर्नर ने अमेरिका और ईरान के बीच भू-राजनीतिक घटनाक्रमों का भी उल्लेख किया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें भारत की महंगाई पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती हैं क्योंकि भारत अपनी तेल आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसके अलावा मानसून की प्रगति भी मुद्रास्फीति के लिए एक महत्वपूर्ण कारक है। अच्छी वर्षा से कृषि उत्पादन बढ़ता है और खाद्य पदार्थों की कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। वहीं कमजोर मानसून खाद्य महंगाई को बढ़ा सकता है।
बाजार की प्रतिक्रिया
आरबीआई गवर्नर के बयान और मौद्रिक नीति के संकेतों के बाद वित्तीय बाजारों में मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिली। भारत की 10 वर्षीय बेंचमार्क सरकारी बॉन्ड यील्ड 2 बेसिस प्वाइंट घटकर 6.85 प्रतिशत पर आ गई। यह दर्शाता है कि निवेशकों को निकट भविष्य में ब्याज दरों में बड़ी वृद्धि की संभावना कम लग रही है। दूसरी ओर, विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.1 प्रतिशत कमजोर होकर 94.85 प्रति डॉलर पर पहुंच गया। मुद्रा विनिमय दर पर वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और विदेशी पूंजी प्रवाह का भी प्रभाव पड़ता है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- रेपो दर भारतीय रिजर्व बैंक की प्रमुख नीतिगत ब्याज दर है।
- मौद्रिक नीति समिति (MPC) में कुल छह सदस्य होते हैं।
- भारत की 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड ऋण बाजार का महत्वपूर्ण संकेतक मानी जाती है।
- विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय रुपया सामान्यतः अमेरिकी डॉलर के मुकाबले उद्धृत किया जाता है।
आरबीआई का ताजा रुख यह संकेत देता है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल आर्थिक वृद्धि और मुद्रास्फीति के बीच संतुलन बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। वैश्विक तेल कीमतों, मानसून की स्थिति और घरेलू मांग जैसे कारक आने वाले महीनों में मौद्रिक नीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। वर्तमान परिस्थितियों में ब्याज दरों में तत्काल बढ़ोतरी की संभावना कम दिखाई देती है, लेकिन आरबीआई आर्थिक आंकड़ों के आधार पर आगे के निर्णय लेता रहेगा।