सुप्रीम कोर्ट ने ट्रॉमा केयर को जीवन के अधिकार का हिस्सा माना
Supreme Court of India ने 26 मई 2026 को एक महत्वपूर्ण फैसले में ट्रॉमा केयर तक पहुंच को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा घोषित किया। यह फैसला “सेवलाइफ फाउंडेशन बनाम भारत संघ” मामले में दिया गया। अदालत ने आपातकालीन चिकित्सा प्रतिक्रिया, एम्बुलेंस सेवाओं और ट्रॉमा डेटा प्रणाली में समयबद्ध सुधार लागू करने के निर्देश भी जारी किए। इस निर्णय को सड़क दुर्घटना पीड़ितों और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं के लिए ऐतिहासिक माना जा रहा है।
अनुच्छेद 21 और जीवन का अधिकार
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है कि किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता। समय-समय पर Supreme Court of India ने अपने विभिन्न फैसलों में इस अनुच्छेद की व्यापक व्याख्या करते हुए स्वास्थ्य, गरिमा और आपातकालीन चिकित्सा सहायता को भी जीवन के अधिकार का हिस्सा माना है। इस नए फैसले ने ट्रॉमा केयर और त्वरित चिकित्सा सहायता को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान की है।
आपातकालीन हेल्पलाइन का एकीकरण
अदालत ने निर्देश दिया कि 100, 101, 102, 108, 1033 और 1091 जैसी आपातकालीन हेल्पलाइन को तीन महीने के भीतर एकीकृत राष्ट्रीय आपातकालीन नंबर 112 से जोड़ा जाए। नंबर 112 भारत की एकीकृत आपातकालीन प्रतिक्रिया सेवा के रूप में कार्य करता है और इसे इमरजेंसी रिस्पॉन्स सपोर्ट सिस्टम के तहत विकसित किया गया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य संकट की स्थिति में नागरिकों को तेज और समन्वित सहायता उपलब्ध कराना है।
ट्रॉमा रजिस्ट्री और एम्बुलेंस सुधार
केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को आठ सप्ताह के भीतर राष्ट्रीय ट्रॉमा रजिस्ट्री के लिए दिशा-निर्देश जारी करने का आदेश दिया गया है। इसके बाद राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सार्वजनिक और निजी अस्पतालों को शामिल करते हुए राज्य स्तरीय ट्रॉमा रजिस्ट्री बनानी होगी। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि सभी पंजीकृत एम्बुलेंस राष्ट्रीय एम्बुलेंस कोड का पालन करें, उनमें जीपीएस या वाहन ट्रैकिंग सिस्टम लगाया जाए और उन्हें हेल्पलाइन 112 से जोड़ा जाए।
गुड सेमेरिटन और कैशलेस उपचार योजना
अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सड़क दुर्घटना पीड़ितों की सहायता करने वाले “गुड सेमेरिटन” नागरिकों के लिए शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित करने का निर्देश दिया। साथ ही जिन राज्यों ने “कैशलेस ट्रीटमेंट ऑफ रोड एक्सीडेंट विक्टिम्स स्कीम 2025” यानी पीएम राहत योजना लागू नहीं की है, उन्हें तीन महीने के भीतर इसे लागू करने का आदेश दिया गया। अदालत ने कहा कि ऐसा न करना मोटर वाहन अधिनियम 1988 का उल्लंघन माना जाएगा।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की सुरक्षा प्रदान करता है।
- 112 भारत की एकीकृत राष्ट्रीय आपातकालीन हेल्पलाइन है।
- मोटर वाहन अधिनियम 1988 भारत में सड़क परिवहन और यातायात का कानूनी ढांचा प्रदान करता है।
- गुड सेमेरिटन नियम सड़क दुर्घटना पीड़ितों की मदद करने वाले लोगों की सुरक्षा से जुड़े हैं।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारत की आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था और सड़क सुरक्षा प्रणाली में बड़े सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे दुर्घटना पीड़ितों को समय पर इलाज मिलने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद मिलने की उम्मीद है।