विश्व बैंक ने भारत को 1.5 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता को दी मंजूरी
18 जून 2026 को विश्व बैंक के कार्यकारी निदेशकों के बोर्ड ने भारत के लिए 1.5 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता को मंजूरी दी। यह वित्तपोषण निजी क्षेत्र के नेतृत्व में रोजगार सृजन और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से तैयार किए गए “बूस्टिंग जॉब क्रिएशन इन द प्राइवेट सेक्टर डेवलपमेंट पॉलिसी फाइनेंसिंग” कार्यक्रम से जुड़ा है। इस पहल का मुख्य लक्ष्य भारत में संरचनात्मक सुधारों को गति देना और रोजगार के नए अवसरों का सृजन करना है, ताकि देश की बढ़ती कार्यशील आबादी को बेहतर आर्थिक अवसर मिल सकें।
निजी क्षेत्र विकास नीति वित्तपोषण का महत्व
डेवलपमेंट पॉलिसी फाइनेंसिंग (डीपीएफ) विश्व बैंक का एक महत्वपूर्ण वित्तीय साधन है, जिसके माध्यम से सदस्य देशों को नीतिगत और संस्थागत सुधारों के लिए बजटीय सहायता प्रदान की जाती है। यह सहायता किसी एक भौतिक परियोजना के निर्माण के बजाय व्यापक आर्थिक और प्रशासनिक सुधारों को लागू करने पर केंद्रित होती है। भारत के लिए स्वीकृत यह वित्तीय पैकेज कर प्रणाली, व्यापार, निवेश, श्रम विनियमन, उद्यमिता और पूंजी तक पहुंच जैसे क्षेत्रों में सुधारों का समर्थन करेगा। इन सुधारों का उद्देश्य निजी निवेश को बढ़ावा देना और व्यवसायों के विस्तार के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना है।
श्रम सुधार और कारोबारी वातावरण
भारत ने नवंबर 2025 में 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को समाहित करते हुए चार प्रमुख श्रम संहिताएं लागू कीं। इनमें वेतन संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता तथा व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य परिस्थितियां संहिता शामिल हैं। इन सुधारों का उद्देश्य श्रम कानूनों को सरल और अधिक प्रभावी बनाना है। इसके साथ ही कर प्रणाली को सरल बनाने, व्यापार प्रक्रियाओं को सुगम करने तथा निवेश को आकर्षित करने के लिए कई नियामकीय बदलाव भी किए जा रहे हैं। सरकार महिलाओं की श्रम भागीदारी बढ़ाने, उद्यमिता में आने वाली बाधाओं को कम करने और व्यापार एवं निवेश प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी बनाने पर भी विशेष ध्यान दे रही है।
भारत में रोजगार की चुनौती और अवसर
भारत आने वाले दो दशकों तक हर वर्ष लगभग 1.1 करोड़ युवाओं को कार्यबल में जोड़ता रहेगा। इतनी बड़ी संख्या में नए रोजगार अवसर उपलब्ध कराना देश के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती है। विश्व बैंक द्वारा स्वीकृत यह वित्तीय सहायता निजी पूंजी निर्माण, उद्योग विस्तार और उद्यमिता को प्रोत्साहित करके रोजगार सृजन की प्रक्रिया को मजबूत बनाने का प्रयास करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निजी क्षेत्र को बेहतर नीतिगत समर्थन और निवेश-अनुकूल वातावरण मिलता है, तो वह रोजगार निर्माण में बड़ी भूमिका निभा सकता है। इससे आर्थिक विकास के साथ-साथ आय और जीवन स्तर में भी सुधार संभव होगा।
विश्व बैंक और दक्षिण एशिया में उसकी भूमिका
विश्व बैंक की स्थापना वर्ष 1944 में हुई थी और इसका मुख्यालय अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डी.सी. में स्थित है। यह संस्था सदस्य देशों को विकास परियोजनाओं, आर्थिक सुधारों और सामाजिक विकास कार्यक्रमों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती है। दक्षिण एशिया विश्व बैंक के प्रमुख परिचालन क्षेत्रों में से एक है, जिसमें भारत सबसे महत्वपूर्ण उधार लेने वाले देशों में शामिल है। वर्तमान में जोहानेस ज़ुट दक्षिण एशिया क्षेत्र के लिए विश्व बैंक के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य कर रहे हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की स्थापना 1944 के ब्रेटन वुड्स सम्मेलन के बाद हुई थी।
- डेवलपमेंट पॉलिसी फाइनेंसिंग का उपयोग नीतिगत सुधारों के समर्थन के लिए किया जाता है, न कि किसी एक निर्माण परियोजना के लिए।
- भारत की चार श्रम संहिताओं ने 29 केंद्रीय श्रम कानूनों का स्थान लिया है।
- विश्व बैंक का कार्यकारी निदेशक मंडल ऋण और नीतिगत वित्तपोषण प्रस्तावों को मंजूरी देने के लिए जिम्मेदार होता है।
भारत को मिली यह नई वित्तीय सहायता देश में रोजगार सृजन, निजी निवेश को बढ़ावा देने और आर्थिक सुधारों को गति देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। यदि इन सुधारों का प्रभावी क्रियान्वयन होता है, तो इससे भारत की अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक मजबूती मिलने के साथ-साथ करोड़ों युवाओं के लिए नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।