लद्दाख में भारत के पहले पेट्रोग्लिफ संरक्षण पार्क की आधारशिला रखी गई

लद्दाख में भारत के पहले पेट्रोग्लिफ संरक्षण पार्क की आधारशिला रखी गई

भारत की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए 19 अप्रैल 2026 को लद्दाख में देश के पहले पेट्रोग्लिफ संरक्षण पार्क की आधारशिला रखी गई। विश्व धरोहर दिवस के अवसर पर इस परियोजना का उद्घाटन सिंधु नदी के तट पर किया गया। उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने इस पहल की शुरुआत करते हुए कहा कि लद्दाख की सदियों पुरानी शैल-नक्काशियों को पर्यटन दबाव, अवसंरचना विकास और पर्यावरणीय क्षति जैसे बढ़ते खतरों से बचाना अत्यंत आवश्यक है।

यह परियोजना न केवल पुरातात्विक महत्व की है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक पहचान और हिमालयी विरासत को संरक्षित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण प्रयास मानी जा रही है।

पेट्रोग्लिफ क्या होते हैं

पेट्रोग्लिफ प्राचीन मानव समुदायों द्वारा चट्टानों की सतह पर सीधे उकेरी गई आकृतियां, प्रतीक और चित्र होते हैं। ये चित्र किसी रंग से नहीं बनाए जाते, बल्कि पत्थर पर खुदाई या नक्काशी के माध्यम से बनाए जाते हैं।

ये शैल-चित्र प्रारंभिक मानव जीवन, प्रवास के मार्ग, धार्मिक मान्यताओं और पर्यावरणीय इतिहास के महत्वपूर्ण पुरातात्विक प्रमाण माने जाते हैं। लद्दाख में पाए जाने वाले पेट्रोग्लिफ में शिकार के दृश्य, आइबेक्स, हिम तेंदुए जैसे जंगली जानवर, और बाद के काल में बौद्ध संस्कृति से जुड़े स्तूप व शिलालेख शामिल हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र में सदियों के दौरान सांस्कृतिक परिवर्तन हुआ।

संरक्षण पार्क क्यों है महत्वपूर्ण

अधिकारियों के अनुसार, लद्दाख में लगभग 400 पेट्रोग्लिफ स्थल मौजूद हैं, जो समूहों या अलग-अलग स्थानों पर फैले हुए हैं। समूहों में स्थित शैल-चित्रों की सुरक्षा अपेक्षाकृत आसान होती है, लेकिन सिंधु और ज़ांस्कर नदियों के किनारे स्थित अलग-थलग पेट्रोग्लिफ सड़क निर्माण, ब्लास्टिंग और जागरूकता की कमी के कारण गंभीर खतरे में हैं।

नया संरक्षण पार्क ऐसे संकटग्रस्त शैल-चित्रों को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित कर संरक्षित करेगा। इससे न केवल उनकी सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि आम लोगों और शोधकर्ताओं के लिए उन्हें समझने और देखने का अवसर भी मिलेगा।

ASI और लद्दाख प्रशासन के बीच समझौता

इस परियोजना को मजबूत करने के लिए अभिलेखागार, पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। इसका उद्देश्य वैज्ञानिक तरीके से इन धरोहरों का संरक्षण और दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

कुछ सबसे पुराने पेट्रोग्लिफ में चीनी, अरबी, संस्कृत और अन्य प्राचीन भाषाओं के शिलालेख भी मिले हैं। यह दर्शाता है कि लद्दाख कभी व्यापार, संस्कृति और सभ्यता के आदान-प्रदान का एक महत्वपूर्ण केंद्र था।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • पेट्रोग्लिफ चट्टानों पर उकेरी गई प्रागैतिहासिक नक्काशियां होती हैं, जबकि पिक्टोग्राफ रंगों से बनाए गए चित्र होते हैं।
  • लद्दाख दक्षिण और मध्य एशिया में प्रागैतिहासिक शैल-कला के सबसे बड़े संग्रहों में से एक है।
  • डोमखर, अल्ची, चिलिंग, दाह हनु और तांगत्से लद्दाख के प्रमुख पेट्रोग्लिफ स्थल हैं।
  • विश्व धरोहर दिवस हर वर्ष 18 अप्रैल को सांस्कृतिक विरासत संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है।

उपराज्यपाल ने पेट्रोग्लिफ को “ओपन-एयर म्यूजियम” बताते हुए पेट्रोग्लिफ और बौद्ध सर्किट जैसे हेरिटेज टूरिज्म मार्ग विकसित करने की बात कही। उनका मानना है कि संरक्षण को विकास योजना का हिस्सा बनाना चाहिए और इसे केवल प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी समझना चाहिए। स्थानीय समुदायों, बौद्ध भिक्षुओं, युवाओं और अन्य हितधारकों को इस साझा विरासत का संरक्षक बनने के लिए प्रेरित किया गया है। यह संरक्षण पार्क भविष्य में पर्यटन, विकास और सांस्कृतिक धरोहर के बीच संतुलन का एक आदर्श मॉडल बन सकता है।

Originally written on April 22, 2026 and last modified on April 22, 2026.

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