भू-आधार (ULPIN) से बदल रही भारत की भूमि अभिलेख व्यवस्था

भू-आधार (ULPIN) से बदल रही भारत की भूमि अभिलेख व्यवस्था

भारत में भूमि अभिलेखों को अधिक पारदर्शी, सटीक और डिजिटल बनाने के लिए यूनिक लैंड पार्सल आइडेंटिफिकेशन नंबर (ULPIN) यानी भू-आधार प्रणाली को तेजी से लागू किया जा रहा है। यह 14 अंकों का अल्फान्यूमेरिक कोड है, जो प्रत्येक भूमि पार्सल को एक विशिष्ट पहचान प्रदान करता है। नवंबर 2025 तक देश के 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 36 करोड़ से अधिक भूमि पार्सलों को ULPIN आवंटित किया जा चुका था। यह पहल भूमि अभिलेखों के आधुनिकीकरण और डिजिटल शासन को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

क्या है यूनिक लैंड पार्सल आइडेंटिफिकेशन नंबर (ULPIN)?

ULPIN एक भू-संदर्भित पहचान संख्या है, जिसे किसी भूमि पार्सल या भूखंड को दी जाती है। यह संख्या उस भूमि के भौगोलिक निर्देशांकों (Latitude-Longitude) से जुड़ी होती है, जिससे प्रत्येक भूखंड की अलग और स्पष्ट पहचान सुनिश्चित होती है। इस व्यवस्था के माध्यम से भूमि स्वामित्व, सीमाओं और अन्य रिकॉर्ड्स को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सुरक्षित और व्यवस्थित रूप से रखा जा सकता है।

डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम की भूमिका

भू-आधार, डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम (DILRMP) का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह केंद्रीय क्षेत्र की योजना वर्ष 2016 में शुरू की गई थी। योजना का उद्देश्य भूमि रिकॉर्ड्स को डिजिटाइज करना, भू-मानचित्रों को आधुनिक बनाना तथा भूमि संबंधी सेवाओं को अधिक पारदर्शी बनाना है। केंद्र सरकार ने इस योजना को वर्ष 2025-26 तक बढ़ाया है, जिसके लिए 875 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

राज्यों में तेजी से हो रहा क्रियान्वयन

देश के कई राज्य भू-आधार प्रणाली को लागू करने के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं। दिल्ली सरकार ने राजधानी के प्रत्येक भूमि पार्सल को 14 अंकों का ULPIN देने की योजना बनाई है। इसके लिए राजस्व विभाग और सर्वे ऑफ इंडिया मिलकर कार्य कर रहे हैं। पश्चिमी दिल्ली के तिलंगपुर कोटला गांव में किए गए पायलट प्रोजेक्ट के तहत 274 भूमि रिकॉर्ड तैयार किए गए। महाराष्ट्र ने 7 फरवरी 2026 से कृषि भूमि उप-विभाजनों के मापन और भू-आधार संख्या आवंटन का राज्यव्यापी अभियान शुरू किया है। वहीं उत्तर प्रदेश भी भूमि अभिलेखों के आधुनिकीकरण के तहत भूखंडों को ULPIN प्रदान कर रहा है। इन परियोजनाओं में ड्रोन इमेजरी और जियोस्पेशियल तकनीकों का व्यापक उपयोग किया जा रहा है।

भूमि अभिलेखों में तकनीक का बढ़ता महत्व

आधुनिक भूमि प्रबंधन में जियोरेफरेंसिंग और ड्रोन सर्वेक्षण महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। भूमि रिकॉर्ड्स में सामान्यतः स्वामित्व विवरण, सर्वे नंबर, क्षेत्रफल, सीमाएं और नामांतरण (म्यूटेशन) संबंधी जानकारी शामिल होती है। जियोरेफरेंसिंग के माध्यम से भूमि को उसके वास्तविक भौगोलिक निर्देशांकों से जोड़ा जाता है, जबकि ड्रोन आधारित कैडस्ट्रल सर्वे भूमि मानचित्रण को अधिक सटीक बनाते हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • ULPIN का पूरा नाम यूनिक लैंड पार्सल आइडेंटिफिकेशन नंबर (Unique Land Parcel Identification Number) है।
  • भू-आधार एक 14 अंकों का अल्फान्यूमेरिक कोड होता है, जो प्रत्येक भूमि पार्सल को विशिष्ट पहचान देता है।
  • डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम (DILRMP) वर्ष 2016 में शुरू किया गया था।
  • सर्वे ऑफ इंडिया भारत की प्रमुख मानचित्रण और भू-स्थानिक सर्वेक्षण एजेंसी है।
  • भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार भूमि राज्य सूची का विषय है।

भारत में भूमि अभिलेखों का डिजिटलीकरण प्रशासनिक सुधारों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। भू-आधार जैसी पहलें भूमि संबंधी विवादों को कम करने, रिकॉर्ड्स की सटीकता बढ़ाने और नागरिकों को बेहतर सेवाएं उपलब्ध कराने में सहायक सिद्ध हो रही हैं। आने वाले वर्षों में यह प्रणाली देश की भूमि प्रबंधन व्यवस्था को अधिक आधुनिक और पारदर्शी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

Originally written on June 24, 2026 and last modified on June 24, 2026.

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