परमाणु कचरे का काल: वैज्ञानिकों ने ढूंढ निकाला यूरेनियम खाने वाला अनोखा बैक्टीरिया

परमाणु कचरे का काल: वैज्ञानिकों ने ढूंढ निकाला यूरेनियम खाने वाला अनोखा बैक्टीरिया

सदियों से विज्ञान की दुनिया में यह माना जाता रहा है कि परमाणु कचरा (Radioactive Waste) और यूरेनियम जैसी भारी धातुएं पृथ्वी के हर जीव के लिए साक्षात मौत हैं। यूरेनियम का रेडिएशन इंसानों के डीएनए को नष्ट कर सकता है, कैंसर पैदा कर सकता है और पर्यावरण को हजारों साल के लिए बंजर बना सकता है। लेकिन हाल ही में दुनिया भर के वैज्ञानिकों को हैरान करने वाली एक ऐसी खोज हुई है, जिसने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। जर्मनी और स्पेन के वैज्ञानिकों ने एक ऐसे अदभुत बैक्टीरिया की खोज की है, जो न सिर्फ अत्यधिक रेडियोएक्टिव वातावरण में जिंदा रह सकता है, बल्कि पानी में घुले खतरनाक यूरेनियम को खाकर उसे एक सुरक्षित और स्थिर खनिज में बदल देता है。 यह खोज जर्मनी के एक पुराने और बंद हो चुके सोवियत यूरेनियम खदान (Wismut GmbH Schlema-Alberoda mine) में की गई है। जब 1990 में इस खदान को बंद किया गया, तो यह रेडियोएक्टिव पानी से पूरी तरह भर गई। जमीन से लगभग 2,000 मीटर नीचे, जहां न तो सूरज की रोशनी है और न ही ऑक्सीजन, वहां वैज्ञानिकों को एक ऐसा सूक्ष्मजीवों का इकोसिस्टम मिला जो इस जानलेवा यूरेनियम के सहारे न सिर्फ जी रहा था, बल्कि प्रकृति को साफ करने के काम में भी जुटा था।

प्रयोगशाला का जादुई प्रयोग: 130 दिनों में 96% यूरेनियम साफ

इस खोज को अंजाम देने के लिए ‘हेल्महोल्ट्ज़-ज़ेंट्रम ड्रेस्डेन-रॉसडॉर्फ’ (HZDR) और स्पेन की यूनिवर्सिटी ऑफ ग्रेनाडा के वैज्ञानिकों ने खदान के जहरीले पानी के सैंपल लिए। उन्होंने प्रयोगशाला में ठीक वैसा ही माहौल तैयार किया जैसा जमीन के दो किलोमीटर नीचे होता है—पूरी तरह ऑक्सीजन रहित और अंधेरा। इसके बाद वैज्ञानिकों ने इन बैक्टीरिया को एक खास तरह का भोजन दिया, जिसे ‘ग्लिसरॉल’ (Glycerol) कहा जाता है। ग्लिसरॉल प्राकृतिक रूप से पेड़-पौधों और वसा के सड़ने से बनता है। जैसे ही इन बैक्टीरिया को ग्लिसरॉल मिला, उनके भीतर का मेटाबॉलिज्म (चयापचय) तेजी से सक्रिय हो गया। प्रयोग के पहले दिन खदान का पानी बिल्कुल पीला दिखाई दे रहा था, लेकिन वैज्ञानिकों ने जो आगे देखा वह किसी चमत्कार से कम नहीं था। ठीक 130 दिनों के भीतर, उस बर्तन के नीचे एक काला गाढ़ा पदार्थ (Precipitate) जमा हो गया और ऊपर का पानी बिल्कुल कांच की तरह साफ हो गया। जांच में पता चला कि पानी में घुला हुआ 96 प्रतिशत यूरेनियम पूरी तरह गायब हो चुका था। बैक्टीरिया ने उस जहरीले यूरेनियम को सोखकर अपनी कोशिका भित्ति (Cell Wall) में कैद कर लिया था।

प्रयोगशाला का जादुई प्रयोग: 130 दिनों में 96% यूरेनियम साफ

विज्ञान को हैरान करने वाला अनोखा रासायनिक खेल

इस बैक्टीरिया ने यूरेनियम को केवल सोखा ही नहीं, बल्कि एक ऐसा अनोखा रासायनिक बदलाव किया जो वैज्ञानिकों ने पहले कभी प्रकृति में होते नहीं देखा था。 आम तौर पर प्रकृति में यूरेनियम +4 या +6 के ऑक्सीडेशन स्टेट (रासायनिक अवस्था) में पाया जाता है। लेकिन इन बैक्टीरिया ने यूरेनियम को एक बेहद दुर्लभ और अस्थिर अवस्था, जिसे ‘पेंटावेलेंट यूरेनियम’ (Uranium V) कहते हैं, में बदल दिया। इस पेंटावेलेंट अवस्था में आते ही यूरेनियम पानी में घुलने की अपनी क्षमता खो देता है। बैक्टीरिया ने इसे खदान के पानी में मौजूद लोहे (Iron) और ऑक्सीजन के साथ मिलाकर एक नए ठोस यौगिक में तब्दील कर दिया, जिसे वैज्ञानिक भाषा में FeU(V)O4 कहा जाता है। इस पूरी प्रक्रिया की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह नया ठोस यौगिक बेहद मजबूत और स्थिर है। वैज्ञानिकों ने जब इस बैक्टीरिया द्वारा बनाए गए पदार्थ को सुखाकर खुली हवा और ऑक्सीजन के संपर्क में लाया, तब भी यह यूरेनियम वापस पानी में घुलनशील अवस्था में नहीं बदला। यानी एक बार बैक्टीरिया ने इसे जकड़ लिया, तो यह हमेशा के लिए एक सुरक्षित पत्थर की तरह जम गया।

विज्ञान को हैरान करने वाला अनोखा रासायनिक खेल

क्या यह बैक्टीरिया यूरेनियम का रेडिएशन खत्म कर देता है?

इस खोज के सामने आने के बाद कई लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह बैक्टीरिया परमाणु कचरे के खतरनाक रेडिएशन को भी खत्म कर देता है? विज्ञान के नियमों के अनुसार इसका जवाब ‘ना’ है। रेडिएशन या रेडियोएक्टिविटी परमाणु के नाभिक (Nucleus) का गुण है, जिसे कोई भी रासायनिक प्रक्रिया या जीव बदल नहीं सकता। बैक्टीरिया यूरेनियम के परमाणु को नष्ट नहीं कर रहा है, बल्कि वह उसके फैलने के तरीके को बदल रहा है。 परमाणु कचरे की सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि जब यह पानी में घुल जाता है, तो यह भूजल (Groundwater) के जरिए नदियों, खेतों और इंसानी बस्तियों तक पहुंच जाता है, जिससे पूरी सभ्यता खतरे में पड़ जाती है। यह बैक्टीरिया यूरेनियम को पानी में बहने वाले ‘तरल जहर’ से बदलकर एक जगह टिके रहने वाले ‘ठोस पत्थर’ में बदल देता है। इससे रेडियोएक्टिव कचरा एक ही जगह पर लॉक हो जाता है और पर्यावरण में फैलने से रुक जाता है।

बायोरेमेडीएशन: पर्यावरण सफाई का एक नया और सस्ता हथियार

आज के समय में दुनिया भर में परमाणु रिएक्टरों और पुरानी खदानों से निकलने वाले जहरीले पानी को साफ करने के लिए बेहद जटिल और महंगी मशीनी व रासायनिक पद्धतियों का इस्तेमाल किया जाता है। इन पारंपरिक तरीकों में अरबों रुपये खर्च होते हैं और अंत में भारी मात्रा में ऐसा जहरीला कीचड़ (Secondary Sludge) बच जाता है, जिसे संभालना एक और बड़ी सिरदर्दी बन जाता है। इस बैक्टीरिया की मदद से ‘बायोरेमेडीएशन’ (Bioremediation)—यानी जीवों के जरिए पर्यावरण को साफ करने की तकनीक—को एक नई दिशा मिली है। इस प्राकृतिक उपाय में न तो बिजली की बड़ी खपत होती है और न ही किसी खतरनाक केमिकल की जरूरत पड़ती है। बस खदानों के भीतर इन बैक्टीरिया को उनकी पसंद का भोजन (ग्लिसरॉल) देना होगा, और वे खुद-ब-खुद पूरे पानी को साफ करने का काम शुरू कर देंगे। हालांकि, वैज्ञानिक अभी इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं कि प्रयोगशाला की बोतलों से निकालकर इसे सीधे विशालकाय खदानों और औद्योगिक स्तर पर कितनी जल्दी लागू किया जा सकेगा। शोधकर्ताओं का मानना है कि इस तकनीक को पूरी तरह से जमीन पर उतारने और फैक्ट्रियों में इस्तेमाल करने में अभी 7 से 12 साल का समय लग सकता है।

कुदरत का सबसे बड़ा रहस्य और भविष्य की उम्मीदें

प्रकृति हमेशा इंसानों को हैरान करती आई है। जहां इंसान यह सोचता है कि अत्यधिक रेडिएशन वाले इलाके में जीवन का नामोनिशान मिट चुका होगा, वहीं कुदरत ऐसे सूक्ष्मजीवों को तैयार कर देती है जो उस जहर को ही अपना ठिकाना बना लेते हैं। यह खोज सिर्फ जर्मनी की खदान तक सीमित नहीं है, बल्कि वैज्ञानिकों का दावा है कि इस प्रक्रिया का इस्तेमाल दुनिया भर के उन तमाम इलाकों में किया जा सकता है जहां यूरेनियम माइनिंग या परमाणु परीक्षणों के कारण पानी और मिट्टी जहरीली हो चुकी है। आने वाले समय में यह तकनीक परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल करने वाले देशों के लिए एक वरदान साबित हो सकती है। जो परमाणु कचरा आज मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है, उसे साफ करने की चाबी शायद इन नन्हे बैक्टीरिया के पास ही छिपी है। विज्ञान और प्रकृति का यह अनोखा तालमेल आने वाली पीढ़ियों को एक साफ और सुरक्षित धरती देने की दिशा में सबसे बड़ा कदम साबित हो सकता है।

Originally written on July 15, 2026 and last modified on July 15, 2026.

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