भारत में तेजी से बढ़ती मेडिकल सीटें: डॉक्टरों की नई फौज या गिरता हुआ एजुकेशन स्टैंडर्ड?
हर साल जब नीट (NEET) का रिजल्ट आता है, तो देश के लाखों घरों में एक अजीब सी बेचैनी देखने को मिलती है। एक-एक नंबर पर हजारों रैंक फिसल जाती है और सरकारी कॉलेज की एक सीट के लिए गलाकाट मुकाबला होता है। लेकिन पिछले कुछ सालों में भारतीय मेडिकल शिक्षा के इतिहास में एक बहुत बड़ा बदलाव आया है। सरकार और नेशनल मेडिकल कमिशन (NMC) ने मिलकर देश में मेडिकल कॉलेजों और MBBS सीटों की संख्या में रिकॉर्ड बढ़ोतरी की है। आंकड़ों के मुताबिक, देश में कुल मेडिकल कॉलेजों की संख्या 820 से ज्यादा हो चुकी है और MBBS सीटों का कुल आंकड़ा 1.29 लाख को पार कर चुका है. महज़ एक दशक पहले यानी 2013-14 में देश के भीतर सिर्फ 51,348 MBBS सीटें थीं। यह करीब 150 फीसदी की ऐतिहासिक छलांग है। पहली नजर में यह खबर किसी भी छात्र या अभिभावक को सुकून दे सकती है, लेकिन क्या इस भारी भरकम संख्या के पीछे सब कुछ उतना ही सुनहरा है जितना दिखता है? क्या सीटें बढ़ने से डॉक्टर बनने का सपना आसान हुआ है या इसने भारतीय मेडिकल व्यवस्था के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं?
कैसे बदली सीटों की पूरी कहानी?
भारत में चिकित्सा शिक्षा का ढांचा सालों तक बेहद सीमित था। लेकिन पिछले पांच-छह सालों में सरकार ने एक खास रणनीति के तहत काम किया। इस रणनीति का मुख्य हिस्सा था—’हर जिले में एक मेडिकल कॉलेज’ की योजना। इसके तहत जिला अस्पतालों (District Hospitals) को अपग्रेड करके उन्हें मेडिकल कॉलेजों में बदला गया। सीटें बढ़ाने के लिए सरकार ने मुख्य रूप से तीन रास्तों का इस्तेमाल किया:
- केंद्र प्रायोजित योजनाएं (Centrally Sponsored Schemes), जिसके तहत नए सरकारी कॉलेजों को फंड दिया गया।
- पुराने मेडिकल कॉलेजों की क्षमता का विस्तार, जहां इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाकर प्रति कॉलेज 50 से 100 सीटें जोड़ी गईं।
- प्राइवेट और डीम्ड यूनिवर्सिटीज को नए कॉलेज खोलने के नियमों में ढील।
इस बदलाव का सबसे बड़ा असर यह हुआ कि उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में, जहां कभी गिने-चुने मेडिकल कॉलेज हुआ करते थे, अब वहां नए सरकारी कॉलेजों का जाल बिछ गया है। मौजूदा आंकड़ों में करीब 63,000 सीटें सरकारी कॉलेजों में हैं और लगभग 66,000 सीटें प्राइवेट व डीम्ड यूनिवर्सिटीज के पास हैं।

सीटों की इस बाढ़ से छात्रों को क्या मिला?
सीटें बढ़ने का सबसे सीधा और सकारात्मक असर कट-ऑफ और उन छात्रों पर पड़ा है जो कुछ नंबरों से रह जाते थे। हर साल लगभग 20 लाख से ज्यादा बच्चे नीट की परीक्षा देते हैं। ऐसे में 5,000 या 10,000 सीटों का बढ़ना भी लाखों छात्रों को एक नया मौका देता है। इसका एक और बड़ा फायदा यह हुआ कि मिडिल क्लास परिवारों के बच्चों को अब रूस, यूक्रेन, चीन या फिलीपींस जैसे देशों का रुख नहीं करना पड़ रहा है। पहले भारत में सीट न मिलने के कारण हजारों छात्र विदेशों में जाकर बेहद मुश्किल हालातों में पढ़ाई करते थे और वहां से लौटने के बाद उन्हें भारत में प्रैक्टिस करने के लिए एक और कठिन परीक्षा (FMGE) पास करनी होती थी। अब भारत में ही ज्यादा सीटें होने से यह ब्रेन ड्रेन और पैसे की बाहर जाने वाली भारी रकम काफी हद तक रुकी है। इसके अलावा, ग्रामीण इलाकों में नए कॉलेज खुलने से वहां के जिला अस्पतालों की हालत सुधरी है। चूंकि मेडिकल कॉलेज से संबद्ध अस्पताल (Affiliated Hospitals) में सीनियर डॉक्टर और फैकल्टी बैठते हैं, इसलिए स्थानीय मरीजों को इलाज के लिए बड़े शहरों की तरफ नहीं भागना पड़ता।

पीजी (PG) का सबसे बड़ा स्पीड ब्रेकर
भले ही देश में ग्रेजुएट यानी MBBS सीटों की संख्या 1.29 लाख पहुंच गई हो, लेकिन पोस्ट-ग्रेजुएट (MD/MS) सीटों की संख्या अभी भी केवल 85,000 के आसपास ही घूम रही है। चिकित्सा जगत में यह एक सर्वविदित सत्य है कि आज के समय में केवल एक साधारण MBBS डिग्री के भरोसे बेहतरीन करियर बनाना मुश्किल हो चुका है। मरीजों को भी स्पेशलिस्ट (विशेषज्ञ) डॉक्टरों पर ज्यादा भरोसा होता है। ऐसी स्थिति में आने वाले सालों में एक भयंकर ‘बॉटलनेक’ यानी जाम की स्थिति बनने वाली है। जब हर साल 1.25 लाख से ज्यादा डॉक्टर कॉलेज से बाहर निकलेंगे, तो वे सभी पीजी की इन सीमित सीटों के लिए दोबारा एक-दूसरे से टकराएंगे। यह मुकाबला नीट यूजी से भी ज्यादा क्रूर और तनावपूर्ण होने वाला है। अगर समय रहते पीजी सीटों के अनुपात को नहीं सुधारा गया, तो देश में बेरोजगार या अंडर-एम्प्लॉयड (कम वेतन पर काम करने वाले) MBBS डॉक्टरों की एक बहुत बड़ी फौज खड़ी हो जाएगी।
फैकल्टी का संकट और गिरती गुणवत्ता
रातों-रात इमारतें खड़ी की जा सकती हैं, फंड पास किए जा सकते हैं और अस्पताल में बेड लगाए जा सकते हैं, लेकिन अनुभवी प्रोफेसर और सीनियर डॉक्टर्स रातों-रात तैयार नहीं किए जा सकते। भारतीय मेडिकल शिक्षा का सबसे डार्क साइड यही है—टीचर्स की भारी कमी। कई नए खुले सरकारी और प्राइवेट कॉलेजों की हालत यह है कि वहां कागजों पर तो प्रोफेसर मौजूद हैं, लेकिन हकीकत में क्लास लेने के लिए पर्याप्त फैकल्टी नहीं है। एनएमसी की कई जांचों में यह सामने आया है कि कॉलेज केवल निरीक्षण (Inspection) के वक्त दूसरे अस्पतालों से डॉक्टरों को किराए पर बुलाकर दिखा देते हैं। इसके साथ ही, कई नए कॉलेजों में ‘क्लीनिकल एक्सपोजर’ यानी मरीजों की संख्या बहुत कम होती है। एक डॉक्टर किताबों से कम और मरीजों के शरीर को देखकर, उनके लक्षणों को समझकर ज्यादा सीखता है। अगर किसी कॉलेज के अस्पताल में ओपीडी (OPD) ही खाली पड़ी है, तो वहां से निकलने वाला छात्र सिर्फ डिग्रीधारी होगा, एक कुशल हकीम या डॉक्टर नहीं।
मेडिकल शिक्षा का बदला हुआ गणित
पूरी तस्वीर को बेहतर ढंग से समझने के लिए पिछले तीन सालों के इन आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है:
| शैक्षणिक वर्ष | कुल मेडिकल कॉलेज | सरकारी MBBS सीटें | प्राइवेट व अन्य सीटें | कुल MBBS सीटें |
| 2024 | 775 | 60,485 | 57,265 | 1,17,750 |
| 2025 | 808 | 62,807 | 60,893 | 1,23,700 |
| 2026 | 824 | 63,160 | 66,443 | 1,29,603 |
यह तालिका साफ दिखाती है कि हर साल कॉलेजों और सीटों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है, लेकिन इसके साथ ही प्राइवेट कॉलेजों की हिस्सेदारी भी तेजी से बढ़ रही है।
निजी कॉलेजों की महंगी फीस और आम आदमी की पहुंच
सीटें बढ़ने की इस पूरी प्रक्रिया में एक बड़ा पेंच यह भी है कि बढ़ी हुई सीटों का एक बड़ा हिस्सा प्राइवेट कॉलेजों और डीम्ड यूनिवर्सिटीज के खाते में जा रहा है। भारत में जहां एक सरकारी मेडिकल कॉलेज की सालाना फीस कुछ हजार से लेकर एक-डेढ़ लाख रुपये तक होती है, वहीं किसी प्राइवेट कॉलेज से MBBS करने का खर्च 60 लाख से लेकर 1.2 करोड़ रुपये तक बैठता है। इतनी भारी-भरकम फीस चुकाना भारत के किसी भी आम या निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार के बस की बात नहीं है। ऐसे में सीटें तो बढ़ रही हैं, लेकिन उनका सीधा लाभ केवल संपन्न परिवारों के बच्चों को ही मिल पा रहा है। जब कोई छात्र एक करोड़ रुपये खर्च करके डॉक्टर बनेगा, तो उसकी पहली प्राथमिकता ग्रामीण इलाकों में जाकर सेवा करने की बजाय किसी बड़े कॉरपोरेट अस्पताल में मोटी सैलरी पाकर अपना लोन या निवेश वसूलने की होगी। यही वजह है कि शहरों में डॉक्टरों की भीड़ बढ़ती जा रही है और गांवों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) आज भी डॉक्टरों के लिए तरस रहे हैं।
नए कॉलेजों की जमीनी हकीकत और घोस्ट फैकल्टी का खेल
मेडिकल कमिशन की सख्त गाइडलाइंस के बावजूद, छोटे शहरों में खुले कॉलेजों में इंफ्रास्ट्रक्चर का भारी अभाव देखने को मिलता है। डिजिटल अटेंडेंस और आधार-लिंक्ड बायोमेट्रिक सिस्टम लागू होने के बाद भी ‘घोस्ट फैकल्टी’ (यानी ऐसे डॉक्टर जो सिर्फ फाइलों में कॉलेज के कर्मचारी हैं पर असल में वहां पढ़ाते नहीं हैं) का खेल पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। कई कॉलेजों में आज भी लैब के आधुनिक उपकरण धूल फांक रहे हैं या उन्हें चलाने वाले टेक्नीशियन ही मौजूद नहीं हैं। जब तक इन बुनियादी कमियों को दूर नहीं किया जाता, तब तक सीटों की संख्या बढ़ाना सिर्फ एक राजनीतिक उपलब्धि बनकर रह जाएगा, स्वास्थ्य सुधार की क्रांति नहीं।