भारत-रूस RELOS समझौता: रक्षा सहयोग का नया अध्याय
भारत और रूस के बीच रक्षा संबंध लंबे समय से रणनीतिक भरोसे और सैन्य सहयोग पर आधारित रहे हैं। हाल ही में दोनों देशों ने रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट (RELOS) को लागू कर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। यह समझौता दोनों देशों को एक-दूसरे के सैन्य अड्डों, बंदरगाहों और वायु सुविधाओं के उपयोग की अनुमति देता है, वह भी युद्धकाल और शांतिकाल दोनों में। यह केवल सैन्य सुविधा का समझौता नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक सुरक्षा वातावरण में रणनीतिक संतुलन और बहुध्रुवीय विदेश नीति का संकेत भी है।
RELOS समझौता क्या है?
RELOS का पूरा नाम रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट है। इसके तहत भारत और रूस एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं का उपयोग कर सकते हैं। समझौते के अनुसार, दोनों देश एक समय में अधिकतम 3,000 सैन्य कर्मियों को एक-दूसरे के क्षेत्र में तैनात कर सकते हैं।
इसके अलावा, एक साथ पांच युद्धपोत और दस सैन्य विमान भी तैनात किए जा सकते हैं। यह व्यवस्था संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण, लंबी दूरी के अभियान और अन्य स्वीकृत मिशनों को आसान बनाने के लिए तैयार की गई है।
लॉजिस्टिक सहायता और रणनीतिक लाभ
इस समझौते का सबसे बड़ा लाभ लॉजिस्टिक समर्थन है। इसके अंतर्गत ईंधन भरने, मरम्मत, स्पेयर पार्ट्स, आपूर्ति की पुनःपूर्ति और रखरखाव जैसी सुविधाएं उपलब्ध होंगी। इससे सैन्य अभियानों की लागत कम होगी और समय की बचत भी होगी।
भारत के लिए यह समझौता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे उसे रूस के आर्कटिक क्षेत्र तक रणनीतिक पहुंच मिल सकती है। वहीं रूस को हिंद महासागर क्षेत्र में बेहतर लॉजिस्टिक समर्थन प्राप्त होगा। रिपोर्टों के अनुसार, भुगतान केवल नकद में नहीं बल्कि वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान के माध्यम से भी किया जा सकता है।
भारत के लिए इसका महत्व
भारत अपनी समुद्री शक्ति को लगातार बढ़ाने और वैश्विक स्तर पर अपनी सैन्य पहुंच मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। ऐसे समय में RELOS का लागू होना काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रूस अभी भी भारतीय सशस्त्र बलों के लिए प्रमुख रक्षा उपकरण आपूर्तिकर्ता देशों में शामिल है।
यह समझौता भारत की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ नीति को भी दर्शाता है, जिसमें भारत बिना किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन में शामिल हुए कई बड़ी शक्तियों के साथ रक्षा सहयोग बनाए रखता है। भारत का अमेरिका के साथ पहले से LEMOA नामक लॉजिस्टिक समझौता है, लेकिन RELOS को कई मामलों में अधिक व्यापक माना जा रहा है।
भू-राजनीतिक और सामरिक प्रभाव
RELOS से दोनों देशों की सैन्य उपस्थिति अपने घरेलू क्षेत्र से दूर भी अधिक प्रभावी रूप से बनी रह सकेगी। भारत के लिए यह ऊर्जा सुरक्षा, उत्तरी समुद्री मार्गों में रुचि और यूरेशियाई संपर्क बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
आर्कटिक क्षेत्र आज वैश्विक राजनीति का नया केंद्र बनता जा रहा है, जहां ऊर्जा संसाधन, नई शिपिंग रूट्स और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा तेजी से बढ़ रही है। भारत के लिए वहां तक रणनीतिक पहुंच भविष्य की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- RELOS का पूरा नाम रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट है, जो भारत और रूस के बीच हुआ है।
- LEMOA भारत और अमेरिका के बीच लॉजिस्टिक सपोर्ट समझौता है, जिसका पूरा नाम लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट है।
- आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ पिघलने के कारण नए समुद्री व्यापार मार्ग खुल रहे हैं, जिससे इसकी सामरिक अहमियत बढ़ गई है।
- रूस लंबे समय से भारत का प्रमुख रक्षा साझेदार रहा है और भारतीय सेना के कई प्रमुख हथियार रूसी मूल के हैं।
RELOS समझौता स्थायी सैन्य तैनाती की बजाय लचीलापन, तत्परता और रणनीतिक गहराई को मजबूत करने का माध्यम है। यह भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और संतुलित रक्षा रणनीति का स्पष्ट उदाहरण है। बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन के बीच यह समझौता भारत को अधिक सक्षम, तैयार और प्रभावशाली रणनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करने में सहायक साबित हो सकता है।