दहेज देने वाली पीड़ित महिला और उसके परिवार पर नहीं चलेगा मुकदमा: सुप्रीम कोर्ट

दहेज देने वाली पीड़ित महिला और उसके परिवार पर नहीं चलेगा मुकदमा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने दहेज निषेध कानून को लेकर एक महत्वपूर्ण स्पष्टता देते हुए कहा है कि यदि दहेज देने वाला पक्ष पीड़ित है, जैसे कि दुल्हन और उसका परिवार, तो उनके खिलाफ दहेज निषेध अधिनियम के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। यह फैसला उस मामले में आया जिसमें एक पति ने अपनी पत्नी और उसके परिवार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग की थी, क्योंकि उन्होंने अपनी शिकायत में स्वीकार किया था कि विवाह के समय दहेज दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि कानून का उद्देश्य पीड़ितों की रक्षा करना है, न कि उन्हें न्याय मांगने पर सजा देना। यह फैसला दहेज उत्पीड़न मामलों में पीड़ितों को बड़ी कानूनी राहत देने वाला माना जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि दहेज निषेध अधिनियम, 1961 सिद्धांत रूप में दहेज देने और लेने—दोनों को अपराध मानता है। लेकिन अधिनियम की धारा 7(3) पीड़ित पक्ष के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई महिला या उसका परिवार वैवाहिक क्रूरता, घरेलू हिंसा या दहेज उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करते समय यह बताता है कि दहेज दिया गया था, तो केवल इस स्वीकारोक्ति के आधार पर उनके खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। कानून का उद्देश्य शिकायत दर्ज कराने वालों को सुरक्षा देना है, न कि उन्हें डराना।

धारा 7(3) क्यों है महत्वपूर्ण

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान समाज की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाया गया था। कई विवाहों में लड़की का परिवार अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि सामाजिक दबाव, भय और मजबूरी के कारण धन, सामान या संपत्ति देता है। यदि ऐसे परिवारों को दहेज देने की बात स्वीकार करने पर अपराधी माना जाए, तो वे शिकायत दर्ज कराने से बचेंगे। इससे दहेज उत्पीड़न के खिलाफ कानून कमजोर हो जाएगा। धारा 7(3) इस असमान स्थिति को स्वीकार करती है और दहेज देने वाले तथा मांगने वाले के बीच अंतर स्थापित करती है।

संसद की मंशा और कानूनी सुरक्षा

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि यह सुरक्षा संयुक्त संसदीय समिति की सिफारिशों के आधार पर कानून में जोड़ी गई थी। समिति ने माना था कि दहेज देने वाले, विशेष रूप से दुल्हन के माता-पिता, को दहेज मांगने या लेने वालों के समान नहीं माना जाना चाहिए। समिति ने यह स्वीकार किया था कि सामाजिक परंपरा, दबाव और भय के कारण अक्सर ऐसे भुगतान किए जाते हैं। इसलिए कानून को इस तरह तैयार किया गया कि कई मामलों में दहेज देने वाले को अपराधी नहीं, बल्कि पीड़ित के रूप में देखा जाए।

कानूनी और सामाजिक महत्व

यह फैसला दहेज विरोधी कानून की पीड़ित-केंद्रित व्याख्या को और मजबूत करता है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि महिलाएं और उनके परिवार दहेज उत्पीड़न की शिकायत करते समय इस डर में नहीं रहेंगे कि उन पर ही आपराधिक मामला दर्ज हो जाएगा। अदालत ने यह भी माना कि दहेज केवल पारिवारिक मामला नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक समस्या है, जो परंपरा, दबाव और वैवाहिक असमानता से जुड़ी है। यह निर्णय न्यायपालिका की उस संवेदनशील सोच को दर्शाता है, जो महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक न्याय को प्राथमिकता देती है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • दहेज निषेध अधिनियम, 1961 दहेज देने और लेने दोनों को अपराध घोषित करता है।
  • धारा 7(3) के तहत पीड़ित पक्ष को दहेज देने की स्वीकारोक्ति पर अभियोजन से सुरक्षा मिलती है।
  • दहेज उत्पीड़न के मामले अक्सर वैवाहिक क्रूरता और घरेलू हिंसा से जुड़े होते हैं।
  • संसदीय समितियों की सिफारिशें कई बार कानूनों में संशोधन और कानूनी सुरक्षा के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला महिलाओं और उनके परिवारों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी सुरक्षा कवच है। इससे दहेज उत्पीड़न के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने में डर कम होगा और न्याय तक पहुंच आसान बनेगी। यह निर्णय केवल कानूनी व्याख्या नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार की दिशा में भी एक मजबूत संदेश है कि पीड़ित को संरक्षण मिलना चाहिए, दंड नहीं।

Originally written on April 19, 2026 and last modified on April 19, 2026.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *