भारत में पाए गए कॉकरोच की 191 प्रजातियाँ, डीएनए बारकोड लाइब्रेरी भी तैयार
भारत में कॉकरोच की जैव विविधता को लेकर एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन सामने आया है। जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ZSI) द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार भारत में अब तक कॉकरोच की 191 प्रजातियाँ दर्ज की जा चुकी हैं। इनमें से 60 प्रतिशत से अधिक प्रजातियाँ भारत में ही पाई जाती हैं, यानी वे स्थानिक (एंडेमिक) हैं। यह अध्ययन टैक्सोनॉमी जर्नल “जूटाक्सा” में प्रकाशित हुआ है। इसके साथ ही वैज्ञानिकों ने भारत की पहली और सबसे बड़ी कॉकरोच डीएनए बारकोड रेफरेंस लाइब्रेरी भी तैयार की है। यह उपलब्धि देश में कीट विविधता और जैविक वर्गीकरण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
भारत में कॉकरोच विविधता
भारत की कॉकरोच प्रजातियों की संख्या अब 191 तक पहुँच गई है। इस अध्ययन में कई नई और पहले से अनदर्ज स्थानिक प्रजातियों की पहचान की गई। वैज्ञानिकों ने 100 से अधिक उच्च गुणवत्ता वाले डीएनए बारकोड तैयार किए, जिनका उपयोग प्रजातियों की सही पहचान और वर्गीकरण में किया जाएगा। मार्च 2026 में ZSI वैज्ञानिकों ने पुणे के पास नाथाचीवाड़ी क्षेत्र में “नियोलोबोप्टेरा पेनिन्सुलारिस” नामक नई प्रजाति की पहचान की थी। इसी खोज के बाद भारत में कॉकरोच प्रजातियों की संख्या 190 हुई थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 191 दर्ज किया गया।
डीएनए बारकोडिंग और टैक्सोनॉमी
डीएनए बारकोडिंग एक वैज्ञानिक तकनीक है जिसमें किसी जीव की पहचान के लिए उसके डीएनए के छोटे आनुवंशिक अनुक्रम का उपयोग किया जाता है। आमतौर पर इसमें माइटोकॉन्ड्रियल “साइटोक्रोम सी ऑक्सीडेज-I” जीन का उपयोग किया जाता है। टैक्सोनॉमी यानी जैविक वर्गीकरण में यह तकनीक विशेष रूप से उपयोगी होती है क्योंकि कई प्रजातियाँ बाहरी रूप से एक जैसी दिखाई देती हैं। डीएनए बारकोडिंग से उनके बीच अंतर स्पष्ट किया जा सकता है और वर्गीकरण संबंधी विवादों का समाधान संभव होता है।
अनुसंधान संस्थान और सहयोग
इस अध्ययन में जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पुणे स्थित पश्चिमी क्षेत्रीय केंद्र, चेन्नई स्थित दक्षिणी क्षेत्रीय केंद्र तथा प्रोफेसर रामकृष्ण मोरे कॉलेज के वैज्ञानिकों ने संयुक्त रूप से कार्य किया। यह परियोजना भारत की कीट विविधता के लिए व्यापक डीएनए रेफरेंस लाइब्रेरी तैयार करने के प्रयास का हिस्सा है। इससे भविष्य में जैव विविधता संरक्षण और वैज्ञानिक अनुसंधान को नई दिशा मिलने की संभावना है।
पारिस्थितिकी और जैव-भौगोलिक महत्व
वैज्ञानिकों के अनुसार भारत की कुछ स्थानिक कॉकरोच प्रजातियों की उत्पत्ति प्राचीन “गोंडवाना” महाद्वीप से जुड़ी हो सकती है। गोंडवाना एक प्राचीन महाद्वीप था, जिसमें वर्तमान भारत, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका और मेडागास्कर शामिल थे। कॉकरोच पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे अपघटक (डिकम्पोजर) के रूप में कार्य करते हैं, पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में सहायता करते हैं और पर्यावरणीय परिवर्तनों के जैव संकेतक भी माने जाते हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- कॉकरोच ब्लैटोडिया गण के अंतर्गत आते हैं, जिसमें दीमक भी शामिल हैं।
- भारत की पहली कॉकरोच डीएनए बारकोड लाइब्रेरी वर्ष 2026 में तैयार की गई।
- डीएनए बारकोडिंग प्रजातियों की पहचान के लिए आनुवंशिक तकनीक है।
- कॉकरोच पारिस्थितिकी तंत्र में पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारत में कॉकरोच जैव विविधता पर हुआ यह अध्ययन वैज्ञानिक अनुसंधान और जैव संरक्षण के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। डीएनए बारकोडिंग जैसी आधुनिक तकनीकों से भविष्य में नई प्रजातियों की पहचान और जैव विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण सहायता मिलेगी।