परिसीमन विधेयक विफल होने से तेज हुई महिला आरक्षण और लोकतंत्र की बहस
संसद में परिसीमन विधेयक से जुड़े संवैधानिक संशोधन विधेयक के पारित न हो पाने के बाद देश की राजनीति में तीखी बहस शुरू हो गई है। कांग्रेस ने इसे लोकतंत्र की जीत बताया, जबकि भाजपा ने इसे महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए बड़ा झटका कहा। यह विधेयक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की प्रक्रिया को परिसीमन और जनगणना से जोड़ता था। लोकसभा में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने के कारण यह विधेयक पारित नहीं हो सका। इसके बाद संघीय ढांचे, प्रतिनिधित्व और चुनावी सुधारों को लेकर राजनीतिक टकराव और गहरा हो गया।
प्रियंका गांधी ने बताया लोकतंत्र की जीत
वायनाड सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने इस विधेयक की हार को लोकतंत्र की बड़ी जीत बताया। उन्होंने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि वह महिलाओं के आरक्षण के मुद्दे का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए कर रही थी। उनका कहना था कि सरकार महिलाओं की हितैषी बनकर खुद को प्रस्तुत करना चाहती थी, जबकि विपक्षी दलों को महिला विरोधी दिखाने की कोशिश की जा रही थी। प्रियंका गांधी ने यह भी कहा कि महिलाओं को केवल प्रचार और राजनीतिक रणनीति से प्रभावित नहीं किया जा सकता, क्योंकि आज की महिला मतदाता पूरी तरह जागरूक है और वास्तविक नीति आधारित फैसलों को समझती है।
2023 के महिला आरक्षण कानून को लागू करने की मांग
प्रियंका गांधी ने सरकार से 2023 में सर्वसम्मति से पारित महिला आरक्षण कानून को तुरंत लागू करने की मांग की। उन्होंने कहा कि यदि इसके लिए कुछ छोटे संशोधन आवश्यक हैं, तो उन्हें बिना परिसीमन और जनगणना से जोड़े किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि महिलाओं को उनका संवैधानिक अधिकार तुरंत मिलना चाहिए, न कि उन्हें व्यापक राजनीतिक गणनाओं का हिस्सा बनाया जाए। कांग्रेस नेताओं ने स्पष्ट किया कि वे महिला आरक्षण के सिद्धांत का पूर्ण समर्थन करते हैं, लेकिन उसके कार्यान्वयन को परिसीमन जैसी शर्तों से जोड़ने का विरोध करते हैं।
संसद में क्या हुआ
संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में 298 वोट समर्थन में और 230 वोट विरोध में मिले, लेकिन इसे पारित होने के लिए विशेष बहुमत यानी उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता थी। यह संख्या पूरी नहीं हो सकी, जिसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने विधेयक को अस्वीकृत घोषित किया। इसके बाद संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि सरकार अब इससे जुड़े अन्य दो विधेयकों को आगे नहीं बढ़ाएगी। भाजपा ने विपक्षी दलों की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने महिलाओं को 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने वाले ऐतिहासिक सुधार को रोक दिया।
भाजपा और विपक्ष के बीच सीधा टकराव
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों पर महिलाओं के प्रतिनिधित्व का ऐतिहासिक अवसर रोकने का आरोप लगाया। भाजपा का कहना है कि यह विधेयक दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधार के लिए आवश्यक था। वहीं राहुल गांधी सहित कई विपक्षी नेताओं ने इसे केवल महिला सशक्तिकरण नहीं, बल्कि देश की चुनावी संरचना को बदलने का प्रयास बताया। उनका तर्क था कि महिलाओं को अधिकार देने में देरी नहीं होनी चाहिए और इसे जनगणना तथा निर्वाचन क्षेत्र पुनर्गठन से जोड़ना संवैधानिक रूप से गलत दिशा है। इसी कारण यह मुद्दा अब केवल महिला आरक्षण नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक और संवैधानिक संघर्ष का विषय बन गया है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- संवैधानिक संशोधन विधेयक को संसद में पारित होने के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।
- महिला आरक्षण प्रस्ताव का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना है।
- परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसमें जनगणना के आधार पर संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं पुनर्निर्धारित की जाती हैं।
- भारत में परिसीमन आयोग एक उच्च स्तरीय निकाय है, जिसके आदेशों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
परिसीमन विधेयक की विफलता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषय पर भी राजनीतिक सहमति आसान नहीं है। एक ओर सरकार इसे ऐतिहासिक सुधार मान रही है, तो दूसरी ओर विपक्ष इसे लोकतांत्रिक संतुलन और संघीय ढांचे के लिए चुनौती बता रहा है। आने वाले समय में यह मुद्दा भारतीय राजनीति में और अधिक गहराई से उभर सकता है, क्योंकि इसमें महिलाओं के अधिकार, राज्यों का प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक संरचना—तीनों जुड़े हुए हैं।