नीदरलैंड ने भारत को लौटाई 11वीं सदी की अनैमंगलम ताम्रपट्टिकाएं
भारत की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के तहत नीदरलैंड ने 15 मई 2026 को 11वीं सदी की अनैमंगलम ताम्रपट्टिकाएं भारत को वापस लौटा दीं। इन ऐतिहासिक ताम्रपट्टिकाओं को “लीडेन प्लेट्स” के नाम से भी जाना जाता है। ये दुर्लभ अभिलेख दक्षिण भारत के शक्तिशाली चोल साम्राज्य के काल से संबंधित हैं और भारतीय इतिहास, प्रशासन तथा धार्मिक संरचना के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
अनैमंगलम ताम्रपट्टिकाओं का ऐतिहासिक महत्व
अनैमंगलम ताम्रपट्टिकाएं महान चोल शासक राजराजा चोल प्रथम के शासनकाल की हैं, जिन्होंने 985 ईस्वी से 1014 ईस्वी तक शासन किया। इन ताम्रपट्टिकाओं में नागपट्टिनम स्थित “चूड़ामणि विहार” नामक बौद्ध मठ को दिए गए भूमि अनुदान और कर व्यवस्था का विस्तृत उल्लेख मिलता है। इससे उस समय की प्रशासनिक प्रणाली, धार्मिक सहिष्णुता और आर्थिक नीतियों की जानकारी प्राप्त होती है। चोल शासकों ने केवल सैन्य शक्ति ही नहीं दिखाई, बल्कि शिक्षा, धर्म और कला को भी संरक्षण दिया। इन अभिलेखों से यह स्पष्ट होता है कि चोल काल में बौद्ध संस्थानों को भी महत्वपूर्ण समर्थन प्राप्त था।
लीडेन प्लेट्स और उनका उपनिवेशकालीन सफर
इन ताम्रपट्टिकाओं को लंबे समय तक नीदरलैंड के लीडेन विश्वविद्यालय में संरक्षित रखा गया था। माना जाता है कि डच अधिकारी फ्लोरेंटियस कैंपर ने 18वीं सदी में भारत के कोरोमंडल तट से इन्हें प्राप्त किया था। उस समय यह क्षेत्र डच औपनिवेशिक प्रभाव के अधीन था। करीब एक शताब्दी से अधिक समय तक विदेश में रहने के बाद अब इन ऐतिहासिक धरोहरों की भारत वापसी को सांस्कृतिक पुनर्स्थापन की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। यह कदम औपनिवेशिक काल में विदेश ले जाए गए सांस्कृतिक अवशेषों की वापसी के वैश्विक प्रयासों का हिस्सा भी है।
ताम्रपट्टिकाओं की संरचना और विशेषताएं
यह संग्रह कुल 24 ताम्रपट्टिकाओं का है, जिनमें 21 बड़ी और 3 छोटी प्लेटें शामिल हैं। इनका कुल वजन लगभग 30 किलोग्राम बताया जाता है। सभी प्लेटें एक तांबे की अंगूठी से जुड़ी हुई हैं, जिस पर चोल राजवंश की शाही मुहर अंकित है। इन प्लेटों पर उत्कीर्ण लेख उस समय की प्रशासनिक भाषा और लेखन शैली का महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इतिहासकारों के लिए ये अभिलेख चोल शासन, भूमि व्यवस्था और धार्मिक संस्थाओं के अध्ययन का महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
सांस्कृतिक संपत्ति की वापसी और कूटनीतिक पहल
इन ताम्रपट्टिकाओं की वापसी भारत, डच सरकार और लीडेन विश्वविद्यालय के बीच लंबे समय तक चले राजनयिक प्रयासों का परिणाम है। नीदरलैंड ने वर्ष 2022 में औपनिवेशिक काल की सांस्कृतिक वस्तुओं की वापसी के लिए नई नीति बनाई थी, जिसके बाद कई देशों की ऐतिहासिक धरोहरों की वापसी की प्रक्रिया तेज हुई। भारत लगातार अपनी सांस्कृतिक विरासत को वापस लाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास कर रहा है। अनैमंगलम ताम्रपट्टिकाओं की वापसी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण सफलता मानी जा रही है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- राजराजा चोल प्रथम ने तंजावुर में प्रसिद्ध बृहदीश्वर मंदिर का निर्माण कराया था, जो यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।
- चोल साम्राज्य 9वीं से 13वीं सदी तक दक्षिण भारत के बड़े हिस्से पर शासन करता था।
- प्राचीन भारत में ताम्रपत्रों का उपयोग भूमि दान, कर छूट और शाही आदेश दर्ज करने के लिए किया जाता था।
- नागपट्टिनम चोल काल में व्यापार और बौद्ध गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र था।
अनैमंगलम ताम्रपट्टिकाओं की भारत वापसी केवल ऐतिहासिक वस्तुओं की वापसी नहीं है, बल्कि यह भारतीय सांस्कृतिक पहचान और विरासत के सम्मान का प्रतीक भी है। यह घटना दर्शाती है कि विश्व स्तर पर अब औपनिवेशिक काल में ले जाई गई सांस्कृतिक संपत्तियों को उनके मूल देशों को लौटाने की भावना मजबूत हो रही है।