काजीरंगा में पहली बार सैटेलाइट टैग वाली गंगा सॉफ्ट-शेल कछुए की रिहाई

काजीरंगा में पहली बार सैटेलाइट टैग वाली गंगा सॉफ्ट-शेल कछुए की रिहाई

भारत ने वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए 15 मई 2026 को असम के काजीरंगा नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व में पहली बार सैटेलाइट-टैग किए गए गंगा सॉफ्ट-शेल कछुए को छोड़ा। यह पहल “एंडेंजर्ड स्पीशीज़ डे” के अवसर पर की गई, जिसका उद्देश्य विलुप्ति के खतरे से जूझ रही प्रजातियों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। यह कछुआ निल्सोनिया गैंगेटिका प्रजाति का है, जो भारतीय उपमहाद्वीप की प्रमुख मीठे पानी की कछुआ प्रजातियों में गिनी जाती है। वैज्ञानिकों और वन्यजीव विशेषज्ञों ने इसे ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी तट पर विशेष निगरानी के साथ छोड़ा।

गंगा सॉफ्ट-शेल कछुए की विशेषताएं

गंगा सॉफ्ट-शेल कछुआ ट्रायोनिकिडी परिवार से संबंधित है, जिसमें नरम खोल वाले मीठे पानी के कछुए शामिल होते हैं। यह प्रजाति दक्षिण एशिया की नदियों, बाढ़ क्षेत्रों और बड़े आर्द्रभूमि इलाकों में पाई जाती है। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ यानी आईयूसीएन ने इसे “एंडेंजर्ड” श्रेणी में रखा है। इसका मतलब है कि यह प्रजाति विलुप्त होने के गंभीर खतरे का सामना कर रही है। नदियों में बढ़ता प्रदूषण, अवैध शिकार, मछली पकड़ने के जाल और आवास नष्ट होने जैसी समस्याएं इसके अस्तित्व के लिए चुनौती बन चुकी हैं।

सैटेलाइट टैगिंग क्यों है महत्वपूर्ण

सैटेलाइट टैगिंग आधुनिक वन्यजीव अनुसंधान की महत्वपूर्ण तकनीक मानी जाती है। इसमें जानवर के शरीर पर एक छोटा ट्रांसमीटर लगाया जाता है, जो उसकी गतिविधियों, स्थान और प्रवास से जुड़ी जानकारी रिकॉर्ड करता है। गंगा सॉफ्ट-शेल कछुए के मामले में यह ट्रांसमीटर पशु चिकित्सकों की निगरानी में लगाया गया। इससे वैज्ञानिक यह समझ पाएंगे कि कछुआ किन क्षेत्रों में अधिक समय बिताता है, उसकी आवाजाही का पैटर्न क्या है और मौसम के अनुसार उसके व्यवहार में किस प्रकार बदलाव आता है। इस प्रकार की वैज्ञानिक निगरानी भविष्य की संरक्षण योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने में मदद करती है।

काजीरंगा का वन्यजीव महत्व

काजीरंगा नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व असम में ब्रह्मपुत्र नदी के बाढ़ क्षेत्र में स्थित है। लगभग 1,302 वर्ग किलोमीटर में फैला यह संरक्षित क्षेत्र घास के मैदानों, आर्द्रभूमियों और नदी तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए प्रसिद्ध है। यह यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल भी है और एक सींग वाले गैंडे, एशियाई हाथी, दलदली हिरण और बंगाल टाइगर जैसे दुर्लभ वन्यजीवों का प्रमुख आवास माना जाता है। अब यहां गंगा सॉफ्ट-शेल कछुए के संरक्षण को लेकर भी नई पहल शुरू की गई है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • गंगा सॉफ्ट-शेल कछुआ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 के भाग-2 में संरक्षित प्रजाति है।
  • अनुसूची-1 में शामिल प्रजातियों को भारत में सबसे उच्च कानूनी सुरक्षा मिलती है।
  • काजीरंगा नेशनल पार्क असम में ब्रह्मपुत्र नदी के बाढ़ क्षेत्र में स्थित है।
  • एंडेंजर्ड स्पीशीज़ डे हर वर्ष 15 मई को मनाया जाता है।

गंगा सॉफ्ट-शेल कछुए की सैटेलाइट टैगिंग और रिहाई भारत में वैज्ञानिक वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। इससे न केवल इस संकटग्रस्त प्रजाति के व्यवहार को समझने में मदद मिलेगी, बल्कि भविष्य में इसके संरक्षण और आवास प्रबंधन की योजनाओं को भी मजबूत आधार मिलेगा।

Originally written on May 15, 2026 and last modified on May 15, 2026.

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