किशोरावस्था की सजा पासपोर्ट जारी करने में बाधा नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

किशोरावस्था की सजा पासपोर्ट जारी करने में बाधा नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी व्यक्ति को किशोरावस्था में मिली सजा उसके भविष्य में पासपोर्ट प्राप्त करने के अधिकार में कानूनी बाधा नहीं बन सकती। 29 मई 2026 को दिए गए इस निर्णय में न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने किशोरों के “भूल जाने के अधिकार” को किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 24 के तहत पूर्ण अधिकार माना। यह फैसला उन सिद्धांतों को मजबूत करता है जिनका उद्देश्य किशोर अपराधियों को वयस्क जीवन में नई शुरुआत का अवसर प्रदान करना है।

मामला क्या था?

यह मामला मोहम्मद यूनुस अंसारी नामक व्यक्ति के पासपोर्ट आवेदन से जुड़ा था। मार्च 2021 में क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी, लखनऊ ने एक प्रतिकूल पुलिस रिपोर्ट के आधार पर उनका आवेदन अस्वीकार कर दिया था। पुलिस रिपोर्ट में उस आपराधिक मामले का उल्लेख था जो उस समय दर्ज हुआ था जब याचिकाकर्ता नाबालिग था। पासपोर्ट प्राधिकरण ने इसी आधार पर आवेदन को खारिज कर दिया, जिसके बाद मामला न्यायालय पहुंचा।

किशोर न्याय अधिनियम का उद्देश्य

किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2000 तथा किशोर न्याय अधिनियम, 2015 में ऐसे प्रावधान शामिल किए गए हैं जिनका उद्देश्य किशोरावस्था में हुई गलतियों के दुष्प्रभाव को व्यक्ति के पूरे जीवन तक न पहुंचने देना है। धारा 24 विशेष रूप से यह सुनिश्चित करती है कि किशोरावस्था में हुई दोषसिद्धि किसी व्यक्ति के भविष्य, रोजगार, शिक्षा या अन्य अवसरों पर स्थायी नकारात्मक प्रभाव न डाले। कानून का उद्देश्य सामाजिक कलंक को समाप्त कर पुनर्वास और सुधार को बढ़ावा देना है।

अनुच्छेद 21 और विदेश यात्रा का अधिकार

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि विदेश यात्रा का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल किशोरावस्था की दोषसिद्धि के आधार पर पासपोर्ट रोका जाता है, तो यह उसके मौलिक अधिकारों के विपरीत होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य किशोरों को दूसरा अवसर देना है, न कि उन्हें जीवनभर के लिए दंडित करना।

न्यायालय के निर्देश

खंडपीठ ने पासपोर्ट आवेदन को अस्वीकार करने वाले आदेश को रद्द कर दिया और अधिकारियों को आवेदन पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी कहा कि पासपोर्ट जारी करते समय किशोरावस्था की दोषसिद्धि को नजरअंदाज किया जाए, जब तक कि पासपोर्ट कानून के तहत कोई अन्य वैध कानूनी बाधा मौजूद न हो।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है।
  • किशोर न्याय अधिनियम, 2015 भारत में कानून से संघर्ष करने वाले बच्चों और उनके पुनर्वास से संबंधित प्रमुख कानून है।
  • धारा 24 किशोरावस्था की दोषसिद्धि के प्रभाव और उससे संबंधित अभिलेखों के संरक्षण से जुड़ी है।
  • इलाहाबाद हाईकोर्ट भारत के सबसे पुराने उच्च न्यायालयों में से एक है और इसका मुख्यालय प्रयागराज में स्थित है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला किशोर न्याय व्यवस्था की मूल भावना को मजबूत करता है, जिसमें सुधार और पुनर्वास को दंड से अधिक महत्व दिया गया है। यह निर्णय सुनिश्चित करता है कि किशोरावस्था में हुई गलतियों के कारण किसी व्यक्ति के भविष्य के अवसर सीमित न हों और उसे समाज में सम्मानपूर्वक जीवन जीने का पूरा अवसर मिल सके।

Originally written on June 16, 2026 and last modified on June 16, 2026.

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