अनुच्छेद 25 और महिलाओं के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट में बड़ी बहस
भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता को लेकर एक बार फिर संवैधानिक बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ के सामने केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 25(1) लोगों को धर्म मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह सीधे तौर पर लैंगिक समानता का प्रावधान नहीं करता। इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कई दिनों तक की।
अनुच्छेद 25 क्या कहता है
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 भाग-3 में शामिल है, जिसमें नागरिकों के मौलिक अधिकार दिए गए हैं। यह अनुच्छेद प्रत्येक व्यक्ति को अंतरात्मा की स्वतंत्रता और किसी भी धर्म को मानने, उसका पालन करने तथा प्रचार करने का अधिकार देता है। हालांकि अनुच्छेद 25(2) राज्य को यह शक्ति भी देता है कि वह धार्मिक गतिविधियों से जुड़ी लौकिक व्यवस्थाओं को नियंत्रित कर सके और सामाजिक सुधार के लिए कानून बना सके। इसी प्रावधान के आधार पर कई बार सरकारें धार्मिक प्रथाओं में सुधार संबंधी कदम उठाती रही हैं।
केंद्र सरकार का क्या तर्क है
केंद्र सरकार ने अदालत में कहा कि धार्मिक समुदायों को अपनी परंपराओं और पूजा-पद्धतियों को तय करने की स्वतंत्रता है। सरकार के अनुसार अलग-अलग धार्मिक संप्रदाय पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग नियम, परंपराएं और पूजा-विधियां निर्धारित कर सकते हैं। सरकार ने यह भी कहा कि धार्मिक मामलों में बार-बार न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं माना जाना चाहिए। इस दौरान सॉलिसिटर जनरल ने सबरीमाला मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि धार्मिक सुधारों का रास्ता अदालतों के बजाय विधायिका के माध्यम से तय होना चाहिए।
समानता के अधिकार की भूमिका
संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 नागरिकों को समानता का अधिकार प्रदान करते हैं। अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, लिंग, नस्ल और जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। वहीं अनुच्छेद 16 सरकारी नौकरियों में समान अवसर की गारंटी देता है। यही कारण है कि जब किसी धार्मिक परंपरा में महिलाओं या पुरुषों के लिए अलग नियम बनाए जाते हैं, तब अदालत को यह तय करना पड़ता है कि धार्मिक स्वतंत्रता अधिक महत्वपूर्ण है या समानता का अधिकार। यह संवैधानिक संतुलन भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा
धर्म और लैंगिक समानता के बीच संबंध केवल भारत तक सीमित नहीं है। वर्ष 2022 में ब्रिटेन सरकार ने भी कहा था कि धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता एक-दूसरे से जुड़ी हुई और परस्पर मजबूत करने वाली अवधारणाएं हैं। इससे स्पष्ट होता है कि दुनिया भर में लोकतांत्रिक देशों में यह विषय लगातार चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- अनुच्छेद 25 भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों वाले भाग-3 में शामिल है।
- अनुच्छेद 15 लिंग के आधार पर भेदभाव को रोकता है।
- अनुच्छेद 16 सरकारी सेवाओं में समान अवसर सुनिश्चित करता है।
- सबरीमाला केस भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के प्रवेश अधिकार से जुड़ा ऐतिहासिक मामला माना जाता है।
सुप्रीम कोर्ट में चल रही यह बहस भविष्य में धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों के बीच संवैधानिक संतुलन तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है। अदालत का अंतिम फैसला केवल एक धार्मिक मुद्दे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर देश में समानता, धर्म और सामाजिक सुधार से जुड़े कई मामलों पर दिखाई दे सकता है।