तेलंगाना और महाराष्ट्र के लैंडफिल दुनिया के शीर्ष मीथेन सुपर-पॉल्यूटर्स में शामिल

तेलंगाना और महाराष्ट्र के लैंडफिल दुनिया के शीर्ष मीथेन सुपर-पॉल्यूटर्स में शामिल

भारत के लिए जलवायु परिवर्तन और शहरी कचरा प्रबंधन से जुड़ी एक गंभीर चिंता सामने आई है। यूसीएलए के STOP Methane Project की रिपोर्ट “Spotlight on the Top 25 Methane Plumes in 2025: Landfills” के अनुसार, तेलंगाना और महाराष्ट्र के दो लैंडफिल स्थलों को वर्ष 2025 में दुनिया के शीर्ष 25 मीथेन “सुपर-पॉल्यूटर्स” में शामिल किया गया है। यह रिपोर्ट बताती है कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण और अव्यवस्थित ठोस कचरा प्रबंधन के कारण लैंडफिल से भारी मात्रा में मीथेन गैस का उत्सर्जन हो रहा है, जो जलवायु और जनस्वास्थ्य दोनों के लिए गंभीर खतरा बन चुका है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इन उत्सर्जनों को नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह न केवल ग्लोबल वार्मिंग को तेज करेगा, बल्कि शहरों में वायु गुणवत्ता और स्वास्थ्य संकट को भी बढ़ाएगा। इसलिए यह रिपोर्ट भारत के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी मानी जा रही है।

रिपोर्ट में क्या सामने आया

रिपोर्ट में 18 देशों के 25 ऐसे लैंडफिल स्थलों की पहचान की गई, जहां अंतरिक्ष से सबसे अधिक मीथेन उत्सर्जन दर्ज किया गया। Carbon Mapper नामक सैटेलाइट तकनीक ने दुनिया भर के 700 से अधिक कचरा स्थलों से लगभग 3,000 मीथेन प्लूम्स को ट्रैक किया।

इन स्थलों से प्रति घंटे 3.6 से 7.5 टन तक मीथेन गैस निकलती पाई गई। अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स के पास स्थित एक लैंडफिल को दुनिया का सबसे बड़ा उत्सर्जक बताया गया, जहां लगभग 7.6 टन प्रति घंटे मीथेन उत्सर्जन दर्ज हुआ। भारत के तेलंगाना और महाराष्ट्र के लैंडफिल भी इसी सूची में शामिल हैं, जो देश की शहरी कचरा प्रबंधन चुनौतियों को उजागर करता है।

मीथेन उत्सर्जन क्यों है खतरनाक

मीथेन एक अत्यंत शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है, जिसका अल्पकालिक तापीय प्रभाव कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कई गुना अधिक होता है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि कोई एक लैंडफिल प्रति घंटे 5 टन मीथेन छोड़ता है, तो उसका जलवायु प्रभाव लगभग 10 लाख एसयूवी वाहनों के बराबर माना जा सकता है।

लैंडफिल से निकलने वाली मीथेन मुख्यतः जैविक कचरे के बिना ऑक्सीजन वाले वातावरण में विघटन से उत्पन्न होती है। चूंकि ये लैंडफिल अक्सर घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों के पास स्थित होते हैं, इसलिए इससे ग्राउंड-लेवल ओजोन बढ़ती है, जिससे श्वसन रोग, एलर्जी और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ती हैं।

भारत के लिए समाधान और सुधार की जरूरत

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार, वैश्विक मानव-जनित मीथेन उत्सर्जन का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा कचरा क्षेत्र से आता है। भारत में नगर ठोस कचरे की विशाल मात्रा के कारण इस क्षेत्र में मीथेन नियंत्रण की सबसे अधिक संभावनाएं मौजूद हैं।

जैविक कचरे का पृथक्करण, लैंडफिल गैस कैप्चर तकनीक, वेस्ट-टू-एनर्जी परियोजनाएं और आधुनिक कचरा प्रसंस्करण प्रणाली इस समस्या को काफी हद तक कम कर सकती हैं। ये उपाय न केवल जलवायु के लिए लाभकारी हैं, बल्कि आर्थिक रूप से भी प्रभावी माने जाते हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • मीथेन एक ग्रीनहाउस गैस है, जिसका अल्पकालिक ताप प्रभाव कार्बन डाइऑक्साइड से कहीं अधिक होता है।
  • लैंडफिल में जैविक कचरे के अवायवीय विघटन से मीथेन गैस उत्पन्न होती है।
  • Carbon Mapper सैटेलाइट तकनीक के माध्यम से मीथेन प्लूम्स की पहचान करता है।
  • UNEP का पूरा नाम यूनाइटेड Nations Environment Programme है।

यह रिपोर्ट दुनिया भर की सरकारों और लैंडफिल संचालकों को तेज़ी से कार्रवाई करने के लिए प्रेरित करने का प्रयास है। भारत जैसे देशों के लिए यह संकेत है कि केवल कचरा निपटान पर्याप्त नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और सतत कचरा प्रबंधन अनिवार्य है। यदि लैंडफिल सुधार, निगरानी और स्वच्छ तकनीकों को प्राथमिकता दी जाए, तो भारत न केवल मीथेन प्रदूषण कम कर सकता है, बल्कि जलवायु लचीलापन और शहरी जनस्वास्थ्य को भी मजबूत बना सकता है।

Originally written on April 22, 2026 and last modified on April 22, 2026.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *