आरबीआई ने एनबीएफसी अपर लेयर के लिए ₹1 लाख करोड़ की सीमा बरकरार रखी

आरबीआई ने एनबीएफसी अपर लेयर के लिए ₹1 लाख करोड़ की सीमा बरकरार रखी

भारतीय रिजर्व बैंक ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के लिए स्केल-आधारित नियामक ढांचे के तहत अपर लेयर (एनबीएफसी-यूएल) में वर्गीकरण हेतु ₹1 लाख करोड़ की परिसंपत्ति सीमा को यथावत रखा है। संशोधित नियम 24 जून 2026 से प्रभावी हो गए हैं। नए प्रावधानों में एनबीएफसी की पहचान के लिए परिसंपत्ति आकार को प्रमुख आधार बनाया गया है, जिससे वर्गीकरण प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक सरल और पारदर्शी हो गई है।

स्केल-आधारित नियामक ढांचे में नया बदलाव

भारतीय रिजर्व बैंक ने एनबीएफसी को विभिन्न नियामक स्तरों में विभाजित किया है ताकि उनके आकार और जोखिम के अनुसार निगरानी की जा सके। पहले अपर लेयर में शामिल करने के लिए विभिन्न मानकों पर आधारित स्कोरिंग प्रणाली अपनाई जाती थी, लेकिन अब इसकी जगह परिसंपत्ति आकार को मुख्य मानदंड बनाया गया है। यदि किसी एनबीएफसी की परिसंपत्तियां ₹1 लाख करोड़ या उससे अधिक हैं, तो उसे अपर लेयर के लिए पात्र माना जाएगा। इस सीमा की समीक्षा अब हर तीन वर्ष में की जाएगी, जबकि प्रारंभिक प्रस्ताव में पांच वर्ष का अंतराल सुझाया गया था। यह बदलाव आर्थिक वृद्धि, मुद्रास्फीति और जोखिम प्रोफाइल में होने वाले परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए किया गया है।

स्वामित्व और सूचीबद्धता से जुड़े नियम

संशोधित नियमों के अनुसार सभी बैंक-स्वामित्व वाली एनबीएफसी, उनके आकार की परवाह किए बिना, अपर लेयर के नियामकीय प्रावधानों के दायरे में आएंगी। हालांकि, शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने से संबंधित नियमों में उन्हें छूट मिलेगी। इसी प्रकार पात्र सरकारी स्वामित्व वाली एनबीएफसी, जैसे आरईसी, पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन और हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन भी अपर लेयर में शामिल रहेंगी तथा उन्हें भी सूचीबद्धता संबंधी प्रावधानों से राहत प्राप्त होगी। आरबीआई ने इस व्यवस्था में स्वामित्व-तटस्थ दृष्टिकोण अपनाया है, जिससे सरकारी और निजी संस्थानों के लिए समान नियामकीय सिद्धांत लागू हों।

इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनियों को बड़ी राहत

भारतीय रिजर्व बैंक ने अपर लेयर की इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनियों के लिए बड़े एक्सपोजर की सीमा को टियर-1 पूंजी के 35 प्रतिशत से बढ़ाकर 45 प्रतिशत कर दिया है। यह संशोधन भी 24 जून 2026 से प्रभावी है। इस कदम का उद्देश्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराने की क्षमता को मजबूत करना है। टियर-1 पूंजी किसी वित्तीय संस्था की मूल पूंजी क्षमता का प्रमुख संकेतक मानी जाती है और वित्तीय स्थिरता का महत्वपूर्ण आधार होती है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • भारतीय रिजर्व बैंक ने एनबीएफसी के लिए स्केल-आधारित नियामक ढांचा वर्ष 2021 में लागू किया था।
  • एनबीएफसी ऐसी वित्तीय संस्थाएं हैं जो ऋण और अन्य वित्तीय सेवाएं प्रदान करती हैं, लेकिन इनके पास पूर्ण बैंकिंग लाइसेंस नहीं होता।
  • टियर-1 पूंजी किसी बैंक या वित्तीय संस्था की वित्तीय मजबूती और पूंजी पर्याप्तता का प्रमुख मापदंड है।
  • आरबीआई प्रत्येक वर्ष एनबीएफसी की अपर लेयर सूची की समीक्षा करता है, जबकि परिसंपत्ति सीमा की समीक्षा अब प्रत्येक तीन वर्ष में की जाएगी।

भारतीय रिजर्व बैंक का यह संशोधित ढांचा एनबीएफसी क्षेत्र में अधिक स्पष्ट, सरल और प्रभावी नियमन सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। परिसंपत्ति आधारित वर्गीकरण, स्वामित्व-तटस्थ नीति और इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनियों के लिए बढ़ी हुई एक्सपोजर सीमा से वित्तीय प्रणाली की स्थिरता के साथ-साथ आधारभूत ढांचा परियोजनाओं को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।

Originally written on June 25, 2026 and last modified on June 25, 2026.

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