SC-ST आरक्षण में क्रीमी लेयर बहस फिर सुर्खियों में
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आरक्षण में “क्रीमी लेयर” लागू करने की मांग एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंच गई है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने 6 अगस्त 2026 को दाखिल हलफनामे में ऐसी याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा कि आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था सामाजिक और ऐतिहासिक पिछड़ेपन पर आधारित है, केवल आर्थिक स्थिति पर नहीं।
सरकार का तर्क: आरक्षण का आधार सामाजिक पिछड़ापन
केंद्र सरकार के अनुसार SC-ST आरक्षण का ढांचा संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 से जुड़ा है, जो सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान और सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण की अनुमति देते हैं। सरकार ने कहा कि यदि SC-ST कोटे में आय-आधारित बहिष्करण लागू करना है, तो इसके लिए व्यापक तथ्यात्मक अध्ययन और संसद का स्पष्ट नीतिगत निर्णय जरूरी होगा।
हलफनामे में यह भी कहा गया कि आरक्षण नीति का निर्धारण विधायी क्षेत्र में आता है और अदालतों को कार्यपालिका से कोटा नियमों की पुनर्रचना करने को नहीं कहना चाहिए। केंद्र ने शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि कानून बनाना संसद का काम है।
क्रीमी लेयर सिद्धांत किस पर लागू होता है
“क्रीमी लेयर” सिद्धांत भारतीय आरक्षण कानून में अपेक्षाकृत उन्नत वर्गों को लाभ से बाहर रखने की न्यायिक अवधारणा है। केंद्र ने 1992 के इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि यह सिद्धांत मूल रूप से अन्य पिछड़ा वर्गों (OBC) पर लागू हुआ था। इसके बाद 10 अप्रैल 2008 के अशोक कुमार ठाकुर बनाम भारत संघ फैसले का भी हवाला दिया गया, जिसमें OBC आरक्षण के संदर्भ में इस सिद्धांत की चर्चा हुई थी।
सरकार का रुख है कि SC और ST के मामले में यह सिद्धांत अब तक उसी तरह लागू नहीं किया गया है, क्योंकि इन वर्गों का आरक्षण सामाजिक भेदभाव और ऐतिहासिक वंचना की पृष्ठभूमि से जुड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट में चल रही बहस का महत्व
यह मामला केवल आरक्षण की सीमा तय करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी तय करेगा कि क्या आर्थिक मानदंडों के आधार पर SC-ST श्रेणियों के भीतर भी उप-वर्गीकरण या बहिष्करण किया जा सकता है। इसी संदर्भ में 1 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट की सात-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने SC-ST के भीतर उप-वर्गीकरण पर फैसला दिया था, जिससे इस विषय पर नई बहस शुरू हुई।
केंद्र ने यह भी बताया कि SC-ST के लिए कई कल्याणकारी और विकास योजनाओं में पहले से ही साधन-परीक्षण यानी means test का उपयोग होता है, लेकिन शैक्षणिक संस्थानों और राज्य सेवाओं में कोटा तय करते समय आय-सीमा जैसी व्यवस्था समान रूप से लागू नहीं की जाती।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का संवैधानिक उल्लेख क्रमशः अनुच्छेद 341 और 342 में है।
- आरक्षण से जुड़े विशेष प्रावधान अनुच्छेद 15 और 16 में मिलते हैं।
- “क्रीमी लेयर” शब्द भारतीय आरक्षण कानून में 1992 के इंद्रा साहनी मामले से प्रमुख हुआ।
- 10 अप्रैल 2008 का अशोक कुमार ठाकुर फैसला OBC आरक्षण और क्रीमी लेयर चर्चा से जुड़ा है।
अब सुप्रीम कोर्ट में यह तय होना है कि क्या SC-ST आरक्षण में आर्थिक आधार पर किसी तरह का बहिष्करण संवैधानिक रूप से संभव है या नहीं। इस फैसले का असर सामाजिक न्याय, आरक्षण नीति और भविष्य की विधायी बहसों पर गहरा पड़ सकता है।