2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा का रोडमैप

2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा का रोडमैप

भारत ने 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को 100 गीगावाट तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है। इस योजना में देशी रिएक्टर बेड़े का विस्तार, छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों की तैनाती और नागरिक परमाणु क्षेत्र में निजी भागीदारी के लिए नए नियामकीय प्रावधान शामिल हैं। यह कदम ऐसे समय में आया है जब भारत कम-कार्बन, स्थिर और भरोसेमंद बिजली स्रोतों की तलाश में अपनी ऊर्जा संरचना को तेजी से बदल रहा है।

परमाणु ऊर्जा क्यों बन रही है रणनीतिक विकल्प

परमाणु ऊर्जा बिजली उत्पादन का वह माध्यम है जिसमें नियंत्रित नाभिकीय विखंडन के जरिए ऊर्जा बनाई जाती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह मौसम पर निर्भर नहीं होती और लगातार बेसलोड बिजली दे सकती है। यही कारण है कि इसे औद्योगिक विस्तार, शहरी मांग और भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भारत ने अपनी परमाणु नीति को लंबे समय से तीन-चरणीय कार्यक्रम के रूप में विकसित किया है। इसका उद्देश्य घरेलू यूरेनियम संसाधनों का उपयोग करते हुए आगे चलकर थोरियम आधारित प्रणालियों की ओर बढ़ना है। इस मॉडल के तहत पहले भारी जल रिएक्टर, फिर फास्ट ब्रीडर रिएक्टर और अंत में थोरियम-आधारित तकनीक को अपनाने की परिकल्पना की गई थी।

नए रिएक्टर और संस्थागत बदलाव

परमाणु क्षमता विस्तार में अब छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों को भी अहम स्थान दिया जा रहा है। ये अपेक्षाकृत छोटे आकार के, मॉड्यूलर ढंग से लगाए जाने वाले रिएक्टर होते हैं, जिन्हें अलग-अलग जरूरतों के अनुसार चरणबद्ध तरीके से स्थापित किया जा सकता है। इसी दिशा में परमाणु ऊर्जा आयोग ने महाराष्ट्र के तारापुर को 220 मेगावाट के भारत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर और 55 मेगावाट के SMR-55 की अग्रणी इकाइयों के लिए मंजूरी दी है।

भारत में प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर यानी PHWR प्रमुख तकनीक रहे हैं। इनमें प्राकृतिक यूरेनियम ईंधन के रूप में और भारी जल मॉडरेटर व कूलेंट के रूप में इस्तेमाल होता है। दूसरी ओर, BARC देश का प्रमुख परमाणु अनुसंधान संस्थान है, जबकि BHAVINI फास्ट ब्रीडर रिएक्टर परियोजनाओं के लिए जिम्मेदार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी है।

निजी भागीदारी और भविष्य की बिजली जरूरतें

परमाणु क्षेत्र में निजी भागीदारी को लेकर भी नई पहल सामने आई है। SHANTI Act, 2025 के तहत परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 और सिविल लाइबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट, 2010 को निरस्त कर एक नया ढांचा बनाया गया है। इसमें बीमा कवरेज, एकल समग्र लाइसेंस और विश्वसनीय नियामकीय मंजूरी वाले विदेशी-डिज़ाइन रिएक्टरों के लिए प्रावधान शामिल हैं।

इसी बीच, अडानी पावर ने राजस्थान और महाराष्ट्र में संभावित परियोजनाओं के लिए दो परमाणु-समर्पित सहायक कंपनियां बनाई हैं। सरकार की न्यूक्लियर एनर्जी मिशन रणनीति में 700 मेगावाट के बड़े PHWR और छोटे SMR, दोनों को क्षमता विस्तार के साधन के रूप में देखा जा रहा है।

ऊर्जा मांग के नए केंद्रों जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर निर्माण और डेटा सेंटरों के कारण स्थिर बिजली आपूर्ति की जरूरत और बढ़ने की उम्मीद है। ऐसे में परमाणु ऊर्जा को भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और कम-कार्बन विकास रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम तीन चरणों में विकसित किया गया है, ताकि घरेलू यूरेनियम और बाद में थोरियम संसाधनों का उपयोग किया जा सके।
  • PHWR यानी प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर भारत में परमाणु बिजली उत्पादन की प्रमुख तकनीक रही है।
  • फर्स्ट क्रिटिकलिटी वह अवस्था होती है जब रिएक्टर में स्व-निर्वाह योग्य नाभिकीय श्रृंखला अभिक्रिया शुरू हो जाती है।
  • तारापुर भारत के शुरुआती परमाणु ऊर्जा स्थलों में से एक है और अब SMR की अग्रणी इकाइयों के लिए प्रस्तावित है।

2047 का 100 गीगावाट लक्ष्य भारत की ऊर्जा नीति में परमाणु शक्ति की बढ़ती भूमिका को दिखाता है। यह कदम भविष्य की बिजली मांग, औद्योगिक विस्तार और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण—तीनों जरूरतों को एक साथ साधने की कोशिश है।

Originally written on August 15, 2026 and last modified on August 15, 2026.

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