हिमालयी जंगलों में आग रोकने के लिए पाइन नीडल नीति की जरूरत
हिमालयी क्षेत्र में बढ़ती वनाग्नि की समस्या को नियंत्रित करने के लिए संसदीय स्थायी समिति ने पाइन नीडल यानी सूखी चीड़ पत्तियों के उपयोग पर एक राष्ट्रीय नीति बनाने की सिफारिश की है। समिति की 412वीं रिपोर्ट में पश्चिमी हिमालय में जंगलों की आग, उसके कारणों, रोकथाम, बायोमास प्रबंधन और आपदा-प्रतिक्रिया क्षमता पर विस्तार से चर्चा की गई है।
हिमालयी वनाग्नि की चुनौती
रिपोर्ट के अनुसार हिमालयी क्षेत्र में सूखी चीड़ पत्तियां, ढलानदार भू-भाग और मौसमी शुष्कता आग के फैलाव को तेज करते हैं। वनाग्नि सामान्यतः तीन प्रकार की मानी जाती है—सतही आग, क्राउन फायर और ग्राउंड फायर। पश्चिमी हिमालय में चीड़ के जंगलों का बड़ा हिस्सा आग की घटनाओं से जुड़ा पाया गया है, और रिपोर्ट में बताया गया कि चिर पाइन वन लगभग 57 प्रतिशत वनाग्नि घटनाओं से संबंधित हैं।
हिमालय के कई इलाकों में पाइन नीडल को पिरुल भी कहा जाता है। ये सूखी पत्तियां जंगल की जमीन पर जमा होकर ज्वलनशील बायोमास बनाती हैं, जिससे आग लगने और फैलने का खतरा बढ़ जाता है।
राष्ट्रीय पाइन नीडल उपयोग नीति का प्रस्ताव
समिति ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से राज्य सरकारों के साथ मिलकर राष्ट्रीय पाइन-नीडल उपयोग नीति तैयार करने की सिफारिश की है। इसके तहत आग-प्रवण क्षेत्रों की पहचान, सूखे बायोमास के संग्रह के लिए वित्तीय प्रोत्साहन और स्थानीय स्तर पर संग्रह व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया गया है।
रिपोर्ट में एक हिमालयी बायोमास प्रबंधन ढांचा और हिमालयी पिरुल प्रबंधन मिशन शुरू करने का सुझाव भी दिया गया है। समिति का मानना है कि यदि पाइन नीडल को बोझ की बजाय संसाधन के रूप में देखा जाए, तो इससे वनाग्नि जोखिम कम करने के साथ ग्रामीण आजीविका को भी सहारा मिल सकता है।
ऊर्जा उपयोग और आपदा-प्रतिक्रिया पर जोर
समिति ने पाइन नीडल के प्रसंस्करण से बने पेलेट्स के उपयोग को भी बढ़ावा देने की बात कही है। इन पेलेट्स का ऊर्जा मान लगभग 5,500 किलो कैलोरी प्रति किलोग्राम बताया गया है, और इन्हें थर्मल पावर स्टेशनों में को-फायरिंग के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। को-फायरिंग का अर्थ है कोयले के साथ बायोमास या अन्य ईंधनों का संयुक्त उपयोग।
रिपोर्ट में वनाग्नि निगरानी के लिए अंतरिक्ष विभाग से एक समर्पित भूस्थिर उपग्रह को प्राथमिकता देने की सिफारिश की गई है। साथ ही हिमालयी क्षेत्र में वनाग्नि प्रतिक्रिया के लिए कम से कम दो क्षेत्रीय राष्ट्रीय आपदा मोचन बल केंद्र स्थापित करने का सुझाव दिया गया है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- चिर पाइन हिमालयी क्षेत्र की एक शंकुधारी प्रजाति है, जिसकी सूखी पत्तियां वनाग्नि जोखिम बढ़ाती हैं।
- राष्ट्रीय आपदा मोचन बल का गठन आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत किया गया था।
- वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून, भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद के अधीन कार्य करता है।
- को-फायरिंग में कोयले के साथ बायोमास जैसे वैकल्पिक ईंधनों का उपयोग किया जाता है।
समिति ने पश्चिमी हिमालय के लिए क्षेत्र-विशिष्ट ऐतिहासिक-पर्यावरणीय अध्ययन कराने की भी बात कही है, ताकि वनस्पति, भूमि उपयोग और दीर्घकालिक पारिस्थितिक बदलावों को समझकर अधिक प्रभावी नीति बनाई जा सके।