झांसी की परिछा वीयर को मिला वैश्विक विरासत दर्जा
झांसी की 140 साल पुरानी परिछा वीयर को अंतरराष्ट्रीय सिंचाई एवं जल निकासी आयोग (ICID) ने विश्व विरासत सिंचाई संरचना (WHIS) का दर्जा दिया है। यह मान्यता 13 अगस्त 2026 को घोषित की गई। बेतवा नदी पर बनी यह संरचना न केवल इंजीनियरिंग का ऐतिहासिक उदाहरण है, बल्कि बेतवा नहर प्रणाली के जरिए उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बड़े कृषि क्षेत्र को सिंचाई सुविधा भी देती है।
परिछा वीयर क्यों खास है
परिछा वीयर झांसी क्षेत्र में बेतवा नदी पर स्थित एक पत्थर-निर्मित (रबल-स्टोन मासनरी) संरचना है। इसकी लंबाई 1,174 मीटर और नदी तल से ऊंचाई 16.8 मीटर बताई गई है। इसमें 318 स्टील फॉलिंग शटर लगे हैं और जलाशय क्षमता 2,400 मिलियन क्यूबिक फीट है। इतनी बड़ी और पुरानी संरचना का आज भी उपयोग में बने रहना इसे तकनीकी और ऐतिहासिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाता है।
बेतवा नहर प्रणाली और कृषि पर असर
इस वीयर से जुड़ी बेतवा नहर प्रणाली लगभग 2,654 किलोमीटर तक फैली हुई है और उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश के पांच जिलों में 4,28,360 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई करती है। मध्य भारत के कृषि परिदृश्य में ऐसी प्रणालियां जल प्रबंधन, फसल उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम मानी जाती हैं। परिछा वीयर को मिला यह दर्जा इस बात की भी मान्यता है कि पुरानी जल संरचनाएं आज भी आधुनिक जरूरतों के अनुरूप उपयोगी बनी रह सकती हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और ICID की भूमिका
इस नहर प्रणाली का प्रस्ताव सबसे पहले 1855 में कैप्टन स्ट्रेची ने रखा था। निर्माण कार्य 1881 में शुरू हुआ और 1886 में इसे चालू किया गया। उस समय इसकी लागत 40 लाख रुपये थी। परिछा वीयर को झांसी क्षेत्र में ICID की विरासत मान्यता पाने वाली दूसरी प्रमुख संरचना माना जा रहा है; इससे पहले 2022 में सुखवा-डुकवान वीयर को यह दर्जा मिला था। ICID एक अंतरराष्ट्रीय निकाय है जो सिंचाई, जल निकासी और बाढ़ प्रबंधन से जुड़े विषयों पर काम करता है तथा विभिन्न देशों की ऐतिहासिक सिंचाई संरचनाओं की सूची भी रखता है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- ICID का पूरा नाम International Commission on Irrigation and Drainage है।
- WHIS का अर्थ World Heritage Irrigation Structure है।
- परिछा वीयर बेतवा नदी पर स्थित है और बेतवा नहर प्रणाली से जुड़ी है।
- इस नहर प्रणाली का निर्माण 1881 में शुरू हुआ और इसे 1886 में चालू किया गया।
यह मान्यता भारत की पारंपरिक जल संरचनाओं की इंजीनियरिंग क्षमता और दीर्घकालिक उपयोगिता को रेखांकित करती है। साथ ही, यह संकेत देती है कि ऐतिहासिक सिंचाई ढांचे संरक्षण और आधुनिक जल प्रबंधन, दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं।