सुप्रीम कोर्ट ने 31 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी, प्रजनन स्वायत्तता को बताया मौलिक अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने 31 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी, प्रजनन स्वायत्तता को बताया मौलिक अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में 15 वर्षीय नाबालिग लड़की को 31 सप्ताह की गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रजनन संबंधी निर्णय लेने की स्वतंत्रता भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है। न्यायालय ने कहा कि किसी नाबालिग को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर करना उसकी गरिमा, निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा। यह फैसला महिलाओं के शारीरिक स्वायत्तता के अधिकार को और मजबूत करता है।

प्रजनन संबंधी निर्णय का अधिकार सुरक्षित

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि किसी महिला को अपने शरीर से जुड़े निर्णय लेने का अधिकार उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी महिला, विशेषकर नाबालिग, को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था को पूरा करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रजनन स्वायत्तता केवल चिकित्सा का विषय नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार का प्रश्न है। इसलिए ऐसे मामलों में संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण आवश्यक है।

मानसिक तनाव को भी माना गया महत्वपूर्ण आधार

अदालत ने इस मामले में यह भी ध्यान दिया कि नाबालिग लड़की गंभीर मानसिक तनाव से गुजर रही थी और उसने कथित रूप से दो बार आत्महत्या का प्रयास भी किया था। न्यायालय ने माना कि गर्भावस्था जारी रहने से उसे गहरा भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक आघात पहुंच सकता है।

पीठ ने कहा कि ऐसी स्थिति में जबरन गर्भावस्था जारी रखना उसके सम्मानपूर्वक जीवन जीने के अधिकार पर सीधा हमला होगा। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि केवल शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं, मानसिक स्वास्थ्य भी समान रूप से महत्वपूर्ण है।

24 सप्ताह की कानूनी सीमा पर बहस

सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) अधिनियम के तहत गर्भपात की सामान्य कानूनी सीमा 24 सप्ताह है, और यह मामला उस सीमा से आगे बढ़ चुका है। सरकार ने मां और भ्रूण दोनों के लिए चिकित्सा जोखिमों की भी बात कही तथा प्रसव के बाद गोद लेने का विकल्प सुझाया।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नाबालिगों से जुड़े असाधारण मामलों में बच्चे के सर्वोत्तम हित को प्रक्रिया संबंधी सीमाओं से ऊपर रखा जाना चाहिए। अदालत ने मानवीय और संवैधानिक दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • अनुच्छेद 21 भारतीय संविधान के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है।
  • मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) अधिनियम भारत में कानूनी गर्भपात की शर्तों को नियंत्रित करता है।
  • विशेष श्रेणियों में गर्भपात की सामान्य अधिकतम सीमा 24 सप्ताह तक मानी जाती है।
  • भारतीय न्यायालयों ने प्रजनन स्वायत्तता को निजता और गरिमा के अधिकार का हिस्सा माना है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में यह भी कहा कि ऐसे मामलों में राहत न देना नाबालिग की शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन पर स्थायी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि बार-बार ऐसी याचिकाएं खारिज की जाएंगी, तो कमजोर और संवेदनशील लड़कियां न्यायालयों तक पहुंचने से डर सकती हैं। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि प्रजनन संबंधी स्वतंत्रता को सर्वोच्च संवैधानिक संरक्षण मिलना चाहिए।

Originally written on April 27, 2026 and last modified on April 27, 2026.

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