सुप्रीम कोर्ट ने खतरनाक और रेबीज संक्रमित आवारा कुत्तों की इच्छामृत्यु को दी अनुमति

सुप्रीम कोर्ट ने खतरनाक और रेबीज संक्रमित आवारा कुत्तों की इच्छामृत्यु को दी अनुमति

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 19 मई 2026 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए रेबीज से संक्रमित, असाध्य रूप से बीमार या सार्वजनिक रूप से खतरनाक साबित होने वाले आवारा कुत्तों की इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी। यह आदेश न्यायमूर्ति Vikram Nath, Sandeep Mehta और N. V. Anjaria की पीठ द्वारा पारित किया गया। अदालत ने इस निर्णय को सार्वजनिक सुरक्षा और आवारा कुत्तों के प्रबंधन से जुड़े नियमों के तहत आवश्यक बताया।

इच्छामृत्यु का कानूनी आधार

इच्छामृत्यु का अर्थ किसी पशु को उसकी पीड़ा समाप्त करने या सार्वजनिक स्वास्थ्य के खतरे को रोकने के उद्देश्य से कानूनी प्रक्रिया के तहत मृत्यु देना होता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी किसी भी कार्रवाई को एनिमल बर्थ कंट्रोल नियम 2023 और अन्य संबंधित कानूनी प्रावधानों के अनुसार ही किया जाएगा। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि किसी आवारा कुत्ते को इच्छामृत्यु देने से पहले योग्य पशु चिकित्सकों द्वारा उसकी स्थिति का परीक्षण और मूल्यांकन किया जाना अनिवार्य होगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केवल गंभीर रूप से बीमार या अत्यधिक खतरनाक पशुओं पर ही यह कार्रवाई की जाए।

सार्वजनिक स्थानों पर आवारा कुत्तों को लेकर सख्त रुख

सुप्रीम कोर्ट ने 7 नवंबर 2025 के अपने पूर्व आदेश में संशोधन की मांग करने वाली याचिकाओं को भी खारिज कर दिया। उस आदेश में शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, बस अड्डों और अन्य सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने यह भी कहा था कि नसबंदी और टीकाकरण के बाद भी ऐसे कुत्तों को उन्हीं सार्वजनिक स्थानों पर वापस नहीं छोड़ा जाएगा। कोर्ट का मानना है कि सार्वजनिक सुरक्षा को प्राथमिकता देना आवश्यक है, खासकर उन स्थानों पर जहां बच्चों, मरीजों और बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही होती है।

एनिमल बर्थ कंट्रोल व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर

एनिमल बर्थ कंट्रोल यानी एबीसी व्यवस्था भारत में आवारा कुत्तों की नसबंदी, टीकाकरण और जनसंख्या नियंत्रण से संबंधित कानूनी प्रणाली है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को प्रत्येक जिले में कम से कम एक पूर्ण रूप से कार्यरत एबीसी केंद्र स्थापित करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही अदालत ने एंटी-रेबीज दवाओं और टीकों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया। अदालत का मानना है कि प्रभावी टीकाकरण और नसबंदी कार्यक्रम से आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित की जा सकती है और रेबीज जैसी घातक बीमारी को रोका जा सकता है।

अधिकारियों को मिलेगा कानूनी संरक्षण

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसके निर्देशों का पालन करते हुए आधिकारिक कर्तव्य के दौरान सद्भावना में कार्य करने वाले अधिकारियों को आपराधिक मामलों से कानूनी संरक्षण मिलेगा। इसका उद्देश्य अधिकारियों को बिना डर के अदालत के आदेशों को प्रभावी ढंग से लागू करने में सहायता देना है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश के कई हिस्सों में कुत्तों के काटने और रेबीज संक्रमण के मामलों को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। अदालत ने सार्वजनिक स्वास्थ्य और पशु कल्याण के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • रेबीज एक वायरल बीमारी है जो केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है और लक्षण प्रकट होने के बाद लगभग हमेशा घातक साबित होती है।
  • प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स एक्ट, 1960 भारत में पशु कल्याण से संबंधित प्रमुख कानून है।
  • एनिमल बर्थ कंट्रोल नियम, 2023 आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण का कानूनी ढांचा प्रदान करते हैं।
  • भारत में कुत्तों के काटने और रेबीज नियंत्रण को लेकर लंबे समय से सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं बनी हुई हैं।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सार्वजनिक सुरक्षा, पशु कल्याण और स्वास्थ्य प्रबंधन के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे आवारा कुत्तों के प्रबंधन और रेबीज नियंत्रण की व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित और प्रभावी बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

Originally written on May 19, 2026 and last modified on May 19, 2026.

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