सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट में अग्रिम जमानत पर दिया महत्वपूर्ण फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 18 का उपयोग केवल औपचारिक तरीके से करके अग्रिम जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी मामले में न्यायालय को पहले एफआईआर, उपलब्ध साक्ष्यों और आरोपों की प्रकृति की जांच करनी होगी, ताकि यह तय किया जा सके कि कानून के तहत प्रथम दृष्टया अपराध बनता है या नहीं। यह फैसला अग्रिम जमानत से जुड़े मामलों में न्यायिक विवेक और संतुलन को महत्वपूर्ण मानता है।
धारा 18 और अग्रिम जमानत का प्रावधान
एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 18 के तहत दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 438 लागू नहीं होती, यदि प्रथम दृष्टया मामला इस अधिनियम के अंतर्गत आता है। धारा 438 अग्रिम जमानत का प्रावधान करती है, जिसके तहत किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी से पहले अदालत से सुरक्षा मिल सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल एफआईआर में एससी-एसटी एक्ट का उल्लेख होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अदालत को आरोपों की वास्तविकता और उपलब्ध सामग्री का मूल्यांकन करना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि अदालतों को यह देखना होगा कि आरोप वास्तव में जाति आधारित अत्याचार से जुड़े हैं या नहीं। यदि प्रथम दृष्टया अपराध सिद्ध नहीं होता, तो अग्रिम जमानत पर विचार किया जा सकता है। पीठ ने यह भी कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है ताकि कानून का दुरुपयोग न हो और वास्तविक पीड़ितों को न्याय भी मिले।
हाल के अन्य महत्वपूर्ण फैसले
सितंबर 2025 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने धारा 18 के वैधानिक प्रतिबंध को बरकरार रखा था, लेकिन यह भी कहा था कि यदि एफआईआर में प्रथम दृष्टया अपराध नहीं बनता तो सीमित परिस्थितियों में अग्रिम जमानत दी जा सकती है। मार्च 2026 में न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने एक मामले में हाईकोर्ट द्वारा दी गई अग्रिम जमानत को रद्द कर दिया था, क्योंकि आरोप गंभीर पाए गए थे। इसके अलावा नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में अग्रिम जमानत दी थी, जहां कथित अपमानजनक शब्द “बास्टर्ड” था और उसे जातिसूचक टिप्पणी नहीं माना गया।
कानूनी और सामाजिक महत्व
यह फैसला न्यायपालिका द्वारा कानून के संतुलित उपयोग की दिशा में अहम माना जा रहा है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि एससी-एसटी एक्ट का उद्देश्य कमजोर वर्गों की सुरक्षा है, लेकिन साथ ही न्यायिक जांच और तथ्यों का मूल्यांकन भी आवश्यक है। इस निर्णय से भविष्य में अदालतों को अग्रिम जमानत याचिकाओं पर अधिक सावधानी और तथ्यों के आधार पर निर्णय लेने का मार्गदर्शन मिलेगा।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम वर्ष 1989 में लागू हुआ था।
- धारा 18 के तहत एससी-एसटी एक्ट लागू होने पर अग्रिम जमानत पर रोक लगाई गई है।
- दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 अग्रिम जमानत से संबंधित है।
- एससी-एसटी एक्ट की धारा 3 में अत्याचार संबंधी अपराधों की सूची दी गई है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में निष्पक्षता और संवैधानिक संतुलन को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। इससे अदालतों को मामलों की वास्तविक परिस्थितियों का मूल्यांकन करने पर अधिक जोर देने का संकेत मिला है।