सुप्रीम कोर्ट ने ‘उद्योग’ की परिभाषा पर पुराना मानक संशोधित किया
सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशीय संविधान पीठ ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(j) के तहत “उद्योग” की परिभाषा पर बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने 1978 के ऐतिहासिक बेंगलुरु वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा फैसले में तय “ट्रिपल टेस्ट” को पूरी तरह खारिज नहीं किया, लेकिन कहा कि इसकी और स्पष्टता तथा परिष्कार की जरूरत है। यह निर्णय श्रम कानून, औद्योगिक विवादों और श्रम न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने 5:4 के बहुमत से माना कि “उद्योग” तय करने के लिए 1978 वाले ट्रिपल टेस्ट में संशोधन की आवश्यकता है। साथ ही 6:3 के बहुमत से यह भी कहा गया कि पुनर्विचार के लिए भेजा गया संदर्भ वैध था और उस पर सुनवाई की जा सकती थी।
यह मामला राज्य बनाम जय बीर सिंह संदर्भ से जुड़ा था, जिस पर तीन दिन तक लगातार बहस हुई और 19 मार्च 2026 को फैसला सुरक्षित रखा गया था।
1978 के फैसले का असर और नई स्थिति
बेंगलुरु वाटर सप्लाई फैसला दशकों से “उद्योग” की व्याख्या का प्रमुख आधार रहा है। इसी फैसले ने यह तय करने के लिए ट्रिपल टेस्ट दिया था कि कौन-सी गतिविधि औद्योगिक दायरे में आएगी। अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह व्याख्या पूरी तरह समाप्त नहीं होगी, लेकिन भविष्य में इसे अधिक सटीक रूप में समझा जाएगा।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नया संशोधित ट्रिपल टेस्ट भविष्य से लागू होगा। यानी औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत लंबित मामलों का निपटारा पुराने 1978 वाले मानक के आधार पर ही होता रहेगा।
एक और अहम बात यह रही कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1978 की व्याख्या औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के तहत “उद्योग” शब्द पर लागू नहीं होगी। इससे संकेत मिलता है कि नए श्रम संहिताओं के संदर्भ में अलग कानूनी दृष्टिकोण अपनाया जाएगा।
विरोधी मत और संवैधानिक महत्व
पीठ के चार न्यायाधीशों—न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता, न्यायमूर्ति उज्जल भुयान और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची—ने मेरिट पर असहमति जताई। उनका मत था कि बेंगलुरु वाटर सप्लाई का पूर्व निर्णय सही था और उसमें बदलाव की जरूरत नहीं है।
संविधान पीठ का यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 145 के तहत पांच या अधिक न्यायाधीशों वाली पीठ संवैधानिक प्रश्नों पर सुनवाई कर सकती है। श्रम कानूनों में “उद्योग” की परिभाषा तय होना कर्मचारियों, नियोक्ताओं और विवाद निपटान तंत्र—तीनों के लिए निर्णायक होता है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 भारत में औद्योगिक विवादों से जुड़ा एक केंद्रीय कानून है।
- “उद्योग” की परिभाषा धारा 2(j) में दी गई है और यही श्रम न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र को प्रभावित करती है।
- Bangalore Water Supply and Sewerage Board v. A. Rajappa का फैसला 1978 में आया था।
- औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 भारत के श्रम कानूनों के समेकन ढांचे का हिस्सा है।
इस फैसले से श्रम कानून की व्याख्या में एक नया चरण शुरू हुआ है, लेकिन पुराने और लंबित मामलों पर तत्काल असर नहीं पड़ेगा। अब नजर इस बात पर रहेगी कि संशोधित मानक को भविष्य में अदालतें और औद्योगिक न्यायाधिकरण किस तरह लागू करते हैं।