सुप्रीम कोर्ट ने ‘उद्योग’ की परिभाषा को नया संतुलन दिया
सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशीय संविधान पीठ ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(ज) के तहत “उद्योग” की कानूनी व्याख्या पर महत्वपूर्ण फैसला दिया है। स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश बनाम जय बीर सिंह मामले में पीठ ने कहा कि 1978 का बेंगलुरु वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा वाला ढांचा अब भी मान्य है, लेकिन उसे और अधिक स्पष्टता के साथ लागू किया जाना चाहिए, खासकर किसी संस्था के व्यावसायिक स्वरूप को ज्यादा महत्व देते हुए।
1978 के फैसले की बुनियाद और नई व्याख्या
बेंगलुरु वाटर सप्लाई मामले में “ट्रिपल टेस्ट” तय किया गया था, जिसके आधार पर यह देखा जाता था कि कोई गतिविधि उद्योग है या नहीं। इसमें तीन बातें प्रमुख थीं—संगठित गतिविधि, नियोक्ता और कर्मचारी के बीच सहयोग, तथा वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन या वितरण जो मानव आवश्यकताओं की पूर्ति करे। 2026 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी संरचना को बनाए रखा, लेकिन कहा कि अब यह देखना भी जरूरी होगा कि संस्था का स्वरूप वास्तव में कितना व्यावसायिक है।
पीठ के बहुमत ने माना कि पुराने फैसले को पूरी तरह हटाने की जरूरत नहीं है, लेकिन उसकी व्याख्या को अधिक संतुलित और व्यावहारिक बनाना होगा। इस तरह अदालत ने “उद्योग” की परिभाषा को न तो बहुत संकीर्ण किया और न ही अत्यधिक व्यापक रहने दिया।
क्यों अहम है धारा 2(ज)
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में धारा 2(ज) यह तय करने के लिए केंद्रीय प्रावधान थी कि कौन-सी संस्था श्रम कानूनों के दायरे में आएगी। इसी पर यह निर्भर करता था कि किसी विवाद का निपटारा औद्योगिक कानून के तहत होगा या नहीं, और क्या उस संस्था पर छंटनी, पुनर्नियोजन, औद्योगिक न्यायनिर्णयन जैसे प्रावधान लागू होंगे।
यह प्रावधान इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि भारत में सरकारी, अर्ध-सरकारी, शैक्षणिक और सेवा-आधारित संस्थानों को लेकर लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि उन्हें “उद्योग” माना जाए या नहीं। सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला इसी बहस में एक नया न्यायिक संतुलन जोड़ता है।
नए फैसले का प्रभाव और कोड की स्वतंत्र व्याख्या
अदालत ने स्पष्ट किया कि संशोधित ट्रिपल टेस्ट का प्रभाव भविष्य में लागू होगा। यानी जो विवाद पहले से लंबित हैं और जो पुराने 1947 अधिनियम के तहत विचाराधीन हैं, वे अब भी 1978 के फैसले के आधार पर ही तय होंगे।
साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की व्याख्या उसके अपने शब्दों और ढांचे के आधार पर की जाएगी। 1947 के अधिनियम की पुरानी परिभाषा को सीधे नए कोड पर लागू नहीं किया जा सकता। यह बात श्रम कानूनों के नए संहिताकरण दौर में विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में सामान्यतः पांच या उससे अधिक न्यायाधीश होते हैं।
- औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(ज) “उद्योग” की परिभाषा से जुड़ी थी।
- बेंगलुरु वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा का फैसला 1978 में सात-न्यायाधीशीय पीठ ने दिया था।
- औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की जगह श्रम कानूनों के एकीकृत ढांचे का हिस्सा बनाया।
यह फैसला श्रम कानूनों की व्याख्या में अदालत की सावधानी और व्यावहारिक दृष्टिकोण दोनों को दिखाता है। अब “उद्योग” की परिभाषा पुराने न्यायिक ढांचे के साथ तो जुड़ी रहेगी, लेकिन नए कानूनी संदर्भ में उसे अधिक स्पष्ट और सीमित तरीके से समझा जाएगा।